मीडिया-गली
खबरियों की खबर
29 March 2020
प्रिंट मीडिया के लिए भी जान बचाने की लड़ाई है करोना त्रासदी
चीन से शुरू होकर भारत आ पहुंची करोना की त्रासदी ने जहां लोगों की जान मुश्किल में डाल दी है, वहीं इसके आर्थिक दुष्प्रभाव भी काफी गंभीर होने जा रहे हैं। करोना पर नकेल कसने के लिए देशभर में लागू किया गया लॉकडाउन देश की अर्थव्वस्था के लिए एक भारी संकट साबित होगा। सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों पर विराम के चलते कई उद्योग-धंधे तबाही के कगार पर पहुंच जाएंगे। इनमें प्रिंट मीडिया यानि समाचार-पत्र उद्योग भी शामिल है।
देशव्यापी अभी लॉक-डाउन एक सप्ताह भी नहीं हुआ है कि प्रिंट मीडिया पर कोविड-19 की काली छाया का असर साफ नजर आने लगा है। अखबारों के पन्ने कम हुए हैं। उनका वितरण बाधित हुआ है और विज्ञापन नदारद हो गए हैं। जो अखबार 20 से 40 पेज के हुआ करते थे, वे महज 12 से 20 पेज में सिमट कर रह गए हैं। लॉकडाउन के चलते आर्थिक गतिविधियां और बाज़ार-कारोबार ठंडा होने के कारण अखबारोंं के विज्ञापनों पर भी बहुत ही बुरा असर देखने को मिल रहा है। जिन अखबारों में 40 से 60 फीसदी स्पेस विज्ञापनों से भरी रहती थी उन अखबारों में विज्ञापन महज 10 से 20 फीसदी स्पेस में सिमट गए हैं।
घरों में कैद जिन लोगों की सुबह चाय और अखबार से होती थी, वे लोग अब नेट पर ई- पेपर पढ़ने की आदत डाल रहे हैं। बहुत संभव है कि इनमें से ज्यादातर लोग लाक-डाउन की अवधि पूरी होने पर अपने पुराने अखबार पर लौटे ही नहीं।ऐसे में प्रिंट मीडिया की विज्ञापन आय तो कम होगी ही, प्रसार संख्या भी सिकुड़ जाएगी। नतीजे में पत्रकार और गैर-पत्रकार कर्मचारियों पर बड़े पैमाने पर छंटनी की तलवार लटकना लाजिमी है। अखबारों के लिए कागज-स्याही और अन्य सामग्री बनाने वाले उद्योगों पर भी इसका असर पड़ेगा ही पड़ेगा।
प्रिंट मीडिया, जिसे मैं विज्ञापन उद्योग कहता रहा हूं, के इस संभावित भविष्य की कल्पना करके ही सिहरन होती है। काश, यह कल्पना गलत साबित हो और चार दशक तक मेरी आजीविका का साधन रहा प्रिंट मीडिया इस गहरे संकट से उबर सके। करोना संकट के बीच अखबारों की बिक्री को तगड़ा झटका लगने के पीछे एक बड़ी वजह लोगों के मन में बैठी यह धारणा भी है कि अखबार के जरिये उनके घर में वायरस आ सकता है। हालांकि अखबार लगातार डब्लूएचओ के हवाले से यह खबर छाप रहे हैं कि अखबार के जरिये कोरोना का संक्रमण नहीं फैलता, पर लोगों को इसपर यकीन नहीं हो रहा। िलिहाज़ा लोग अखबारों से दूरी बनाते जा रहे हैं। बहुत से अपार्टमेंटों में तो अखबार वालों के प्रवेश पर ही रोक लगा दी गई है। ऐसे में जो लोग चाहते हैं, उन्हें भी इन दिनों अखबार नहीं मिल पा रहा है।
01 September 2015
एक औरंगजेब मिटा रहा दूसरे का नाम
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| चित्र इमनॉमिक टाइम्स से साभार |
कहीं न कहीं इससे उस ऊंचे नाम की छीछालेदर होती ही दिखाई दे रही है। जी हॉ, बात औरंगजेब रोड का नाम बदल कर डा. कलाम के नाम पर किए जाने की ही हो रही है। दुनिया का इतिहास गवाह है कि कोई नया और बड़ा काम किए बिना महज फितूर भरी हरकतों के सहारे इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने की हसरत अकसर इंसान को सनकीपन और तानाशाही के कगार पर ला खड़ा करती है। जर्मनी में हिटलर, इटली में मुसोलिनी, रूस में स्टालिन और जापान में टोजो दशकों पहले ऐसे नजारे दुनिया को दिखा चुके हैं और कालांतर में यह दृश्य अब भारत में उभरता नजर आ रहा है। एक सड़क का नाम बदले जाने पर ऐसी तुलना फौरी तौर पर अतिवाद लग सकती है, पर डेढ़ साल में की गई कारगुजारियों पर नजर डालिए तो नफरत की सियासत का यह सफर बड़े सिलसिलेवार ढंग से आगे बढ़ता नजर आ जाएगा। इंदिरा आवास योजना, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना और यहां तक कि नेहरू की सोच से उपजे योजना आयोग पर भी हुजूर कुछ इसी तरह के नजर ए इनायत कर चुके हैं।
इस दिमागी दिवालियेपन की इस प्रवृत्ति पर तरस और हंसी आती है, जब योजना आयोग की जगह रातो रात एक नई संस्था नीति आयोग खड़ी कर दी गई और ‘नीति’ शब्द का एक अंट-शंट टाइप फुल फार्म भी गढ़ दिया गया। जरा गौर कीजिए इस पर नीति आयोग के ‘नीति’ का फुलफार्म है नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफार्मिंग इंडिया। नाम में इंस्टीट्यूट और आयोग दोनों शब्दों का होना अपने आप में हास्यास्पद है। दुनिया में ऐसी कोई दूसरी संस्था हमने तो नहीं देखी जो इंस्टीट्यूट भी हो और आयोग भी। आपको नजर आए तो जरा गूगल पर खोज कर हमें भी दिखा दीजिए। इसके अलावा इस नामावली में अंग्रेजी शब्दों पर सवार होकर एक हिन्दी शब्द को जस्टीफाई करने की दुश्चेष्टा साफ-साफ नजर आती है और हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्थान का नारा लगा कर प्रखर राष्टवाद का दम भरने वाले यहां भारत के लिए इंडिया शब्द का इस्तेमाल करते नजर आ रहे हैं। विरोधाभास देखिए जरा, दूसरों की डीएनए रिपोर्ट जारी करने वाले महाशय ने किस तरह से अपना डीएनए बदल दिया है यहां।
बहरहाल, चर्चा को एक बार फिर से औरंगजेब रोड पर लगाई जा रही डा. कलाम के नाम की तख्ती पर लाएं तो पहला सवाल जहन में यही उठता है कि कलाम जैसे सर्वप्रिय व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करने का क्या सिर्फ यही तरीका था। क्या किसी जगह का नाम बदल कर ही देश की राजधानी में उनका नाम उकेरा जा सकता था और अगर नाम बदलना ही था तो सरकार को राजपथ या रायसीना रोड क्यों नहीं नजर आई। देश में राजतंत्र तो आजादी के साथ्ा ही खत्म हो चुका है, तो फिर राजपथ क्यों? रायसीना रोड को भी डा. कलाम का नाम देना एक बेहतर विकल्प हो सकता था, क्योंकि जिस राष्ट्रपति भवन में वह रहे वह रायसीना हिल्स पर ही स्थित है। सड़कों से जरा हटकर देखें तो राजधानी दिल्ली में ही नेशनल साइंस सेंटर भी स्थित है। वैज्ञानिक से राष्ट्रपति बने डा. कलाम का नाम अगर इस म्यूजियम को दिया जाता तो क्या यह उनकी शख्सीयत और उपलब्धियों के लिहाज से ज्यादा उपयुक्त नहीं होता?
16 June 2015
कापड़ी की मिस टनकपुर से खाप खफा
इंडिया टीवी और न्यज एक्सप्रेस सहित कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके विनोद कापड़ी की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'मिस टनकपुर हाजिर हों' रिलीज से पहले ही बड़े विवाद में घिर गई है। 26 जून को रिलीज होने वाली इस फिल्म को लेकर कुछ खाप पंचायतों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर की अहलावत खाप पंचायत ने तो बाकायदा विनोद कापड़ी का सर कलम करने का फरमान जारी करते हुए ऐसा करने वाले को इनाम में 51 भैसें देने की घोषणा कर डाली है।
खाप का आरोप है कि कापड़ी ने अपनी फिल्म में पंचायत को गलत तरीके से पेश किया है। खाप का यह ऐलान कापड़ी की फिल्म की रिलीज और उसे चलाने में बाधा बन सकता है क्योंकि कहा जाता है कि पश्चिमी यूपी में खाप-पंचायतें अपने फैसले को लागू करने में भी कोई कसर नही छोड़ती हैं। दूसरी ओर खाप के इस फरमान से फिल्म को रिलीज से पहले ही खासी पब्लिसिटी भी मिल रही है।
उधर एक टीवी चैनल से इस बारे में बातचीत करते हुए विनोद कापड़ी ने कहा है कि पंचायत के लोग पहले उनकी फिल्म देखें। फिल्म देखने के बाद भी अगर वह आपत्ति जताएंगे तो वह उन्हें 51 भैंसें देने को तैयार हैं। कापड़ी का कहना है कि अपने देश में एक बड़ी समस्या यह है कि लोग फिल्म देखने से पहले ही हंगामा करना शुरू कर देते हैं।
खाप का आरोप है कि कापड़ी ने अपनी फिल्म में पंचायत को गलत तरीके से पेश किया है। खाप का यह ऐलान कापड़ी की फिल्म की रिलीज और उसे चलाने में बाधा बन सकता है क्योंकि कहा जाता है कि पश्चिमी यूपी में खाप-पंचायतें अपने फैसले को लागू करने में भी कोई कसर नही छोड़ती हैं। दूसरी ओर खाप के इस फरमान से फिल्म को रिलीज से पहले ही खासी पब्लिसिटी भी मिल रही है।
उधर एक टीवी चैनल से इस बारे में बातचीत करते हुए विनोद कापड़ी ने कहा है कि पंचायत के लोग पहले उनकी फिल्म देखें। फिल्म देखने के बाद भी अगर वह आपत्ति जताएंगे तो वह उन्हें 51 भैंसें देने को तैयार हैं। कापड़ी का कहना है कि अपने देश में एक बड़ी समस्या यह है कि लोग फिल्म देखने से पहले ही हंगामा करना शुरू कर देते हैं।
12 May 2015
राजेश उपाध्याय ने संभाला हिन्दुस्तान के डिजिटल हेड का पद
दैनिक भास्कर समूह में विभिन्न पदों पर करीब दो दशक सेवाएं देने के बाद राजेश उपाध्याय ने हिन्दुस्तान टाइम्स समूह का दामन थाम लिया है।
हिन्दुस्तान में उन्हें डिजिटल कंटेंट हेड बनाया गया, जिसके तहत राजेश हिन्दुस्तान की वेबसाइट का जिम्मा अब उनको सौंपा जा रहा है। हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक शशिशेखर ने अपने साथियों को इस बाबत एक मेल भेज कर इस बारे में औपचारिक रूप से सूचना दे दी है।
मेल में दैनिक भास्कर डॉटकॉम, दिव्य भास्कर डॉटकॉम और दिव्य मराठी डॉटकॉम के हेड के रूप में उनके अनुभव और कामकाज की सराहना भी की गई है।
मेल के मुताबिक डिजिटल प्लेटफार्म को हिन्दुस्तान टाइम्स समूह ने अब उच्च प्राथमिकता देने का फैसला किया है। इसीके तहत हिन्दुस्तान की वेबसाइट को नया तेवर-कलेवर देने के लिए राजेश को लाया गया है। वह सीधे शशि शेखर को रिपोर्ट करेंगे।
हिन्दुस्तान में उन्हें डिजिटल कंटेंट हेड बनाया गया, जिसके तहत राजेश हिन्दुस्तान की वेबसाइट का जिम्मा अब उनको सौंपा जा रहा है। हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक शशिशेखर ने अपने साथियों को इस बाबत एक मेल भेज कर इस बारे में औपचारिक रूप से सूचना दे दी है।
मेल में दैनिक भास्कर डॉटकॉम, दिव्य भास्कर डॉटकॉम और दिव्य मराठी डॉटकॉम के हेड के रूप में उनके अनुभव और कामकाज की सराहना भी की गई है।
मेल के मुताबिक डिजिटल प्लेटफार्म को हिन्दुस्तान टाइम्स समूह ने अब उच्च प्राथमिकता देने का फैसला किया है। इसीके तहत हिन्दुस्तान की वेबसाइट को नया तेवर-कलेवर देने के लिए राजेश को लाया गया है। वह सीधे शशि शेखर को रिपोर्ट करेंगे।
17 April 2015
‘न्यूज ट्रेडर्स’ के खिलाफ मोदी की बोलती बंद, लड़ाई में साथ आए जनजान
मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने के लिए विभिन्न मीडिया घरानों के खिलाफ लड़ रहे पत्रकारों व गैर पत्रकारों का धरना 27 अप्रैल को नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर होने जा रहा है।
मीडिया घरानों और मालिकों को आए दिन कोसने और प्रेस्टीट्यूट जैसी संज्ञा देने वाले मोदी के मंत्री इस मसले पर शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह गाड़े बैठे हैं। लोकसभा चुनाव से पहले मीडिया मालिकों को ‘न्यूज ट्रेडर्स’ की संज्ञा देने और 56 इंच का सीना दिखाने वाले प्रधानमंत्री मोदी की भी इस मसले पर बोलती बंद है। दूसरी ओर कम्यूनिस्ट नेता अतुल अनजान ने इस लड़ाई में पत्रकारों का साथ देने की बात कही है। इससे निश्चित रूप से इस आंदोलन को बल मिलेगा।
अतुल कुमार अंजान ने 27 अप्रैल को जंतर-मंतर पर होने वाले धरने में शामिल होने की स्वीकृति दे दी है। हालांकि उन्होंने यह भी अंदेशा जताया है कि पत्रकार भले ही सुप्रीम कोर्ट में बड़े-बड़े अखबार मालिकों के खिलाफ लड़ रहे हैं, लेकिन जब जरूरत आएगी तो भाग खड़े होंगे।
उन्होंने आईबीएन 7 सहित पिछले कई वर्षों में नौकरी से निकाले गए पत्रकारों के मामलों की मिसाल देते हुए कि हम तो धरने पर पहुंच गए, लेकिन जिनका धरना था वो ही नहीं आए। इसलिए पत्रकार बिरादरी का अब फर्ज बनता है कि वह मजबूती के साथ आगे आकर ऐसी आशंकाओं को गलत साबित करें और बुलंदी के साथ अपने हक की आवाज उठाएं।
मीडिया घरानों और मालिकों को आए दिन कोसने और प्रेस्टीट्यूट जैसी संज्ञा देने वाले मोदी के मंत्री इस मसले पर शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह गाड़े बैठे हैं। लोकसभा चुनाव से पहले मीडिया मालिकों को ‘न्यूज ट्रेडर्स’ की संज्ञा देने और 56 इंच का सीना दिखाने वाले प्रधानमंत्री मोदी की भी इस मसले पर बोलती बंद है। दूसरी ओर कम्यूनिस्ट नेता अतुल अनजान ने इस लड़ाई में पत्रकारों का साथ देने की बात कही है। इससे निश्चित रूप से इस आंदोलन को बल मिलेगा। अतुल कुमार अंजान ने 27 अप्रैल को जंतर-मंतर पर होने वाले धरने में शामिल होने की स्वीकृति दे दी है। हालांकि उन्होंने यह भी अंदेशा जताया है कि पत्रकार भले ही सुप्रीम कोर्ट में बड़े-बड़े अखबार मालिकों के खिलाफ लड़ रहे हैं, लेकिन जब जरूरत आएगी तो भाग खड़े होंगे।
उन्होंने आईबीएन 7 सहित पिछले कई वर्षों में नौकरी से निकाले गए पत्रकारों के मामलों की मिसाल देते हुए कि हम तो धरने पर पहुंच गए, लेकिन जिनका धरना था वो ही नहीं आए। इसलिए पत्रकार बिरादरी का अब फर्ज बनता है कि वह मजबूती के साथ आगे आकर ऐसी आशंकाओं को गलत साबित करें और बुलंदी के साथ अपने हक की आवाज उठाएं।
12 April 2015
जुकर बर्ग के व्हाट्स ऐप को बड़े अंबानी ने दी चुनौती
सोशल साइट फेसबुक शुरू करने वाले मार्क जुकरबर्ग द्वारा बीते वर्ष खरीदी गई व्हाट्स ऐप को एक बार फिर से चुनौती देने की कोशिश की गई है। इस बार चुनौती पेश की गई है बड़े अंबानी यानी रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुखिया मुकेश अंबानी की टेलीकॉम कंपनी रिलायंस जिओ की ओर से।
रिलांयस ने व्हाट्स ऐप की टक्कर में अपना इंस्टेंट मैसेजिंग ऐप 'जिओ' लॉन्च किया है। यह ऐप एंड्रायड और आईओएस दोनों पर काम करेगा। इसमें यूजर को वह सारे फीचर्स तो दिए ही जा रहे हैं, जो व्हाट्स ऐप में मौजूद हैं, कुछ ऐसे फीचर भी इसमें पेश किए गए हैं, जो व्हाट्स ऐप अबतक अपने ग्राहकों को नहीं दे सका है। मिसाल के तौर पर जियो के यूजर वॉयस कॉल के अलावा ग्रुप वॉइस कॉल और वीडियो कॉल भी कर सकेंगे।
जियो एक आम मैसेजिंग ऐप की तरह मैसेज के अलावा फोटो और वीडियो शेयरिंग की सुविधा तो ही देती है, इसके आलावा जियो की मदद से यूजर्स अपने डूडल्स और वॉयस नोट भी बना सकते हैं। इसके अलावा यूजर्स ऐप का उपयोग करते हुए अपने चुनिंदा दोस्तों से अपनी लोकेशन भी शेयर कर सकते हैं। ब्लैकबैरी के बीबीएम मैसेंजर की तरह ही जिओ यूजर को न्यूज, अपडेट और स्पेशल प्रमोशन ब्राउज करने की आजादी भी देता है। इस तरह जियो के यूजर अपने खास लोगों के बीच लगातार बने रह सकते हैं।
रिलांयस ने व्हाट्स ऐप की टक्कर में अपना इंस्टेंट मैसेजिंग ऐप 'जिओ' लॉन्च किया है। यह ऐप एंड्रायड और आईओएस दोनों पर काम करेगा। इसमें यूजर को वह सारे फीचर्स तो दिए ही जा रहे हैं, जो व्हाट्स ऐप में मौजूद हैं, कुछ ऐसे फीचर भी इसमें पेश किए गए हैं, जो व्हाट्स ऐप अबतक अपने ग्राहकों को नहीं दे सका है। मिसाल के तौर पर जियो के यूजर वॉयस कॉल के अलावा ग्रुप वॉइस कॉल और वीडियो कॉल भी कर सकेंगे।
जियो एक आम मैसेजिंग ऐप की तरह मैसेज के अलावा फोटो और वीडियो शेयरिंग की सुविधा तो ही देती है, इसके आलावा जियो की मदद से यूजर्स अपने डूडल्स और वॉयस नोट भी बना सकते हैं। इसके अलावा यूजर्स ऐप का उपयोग करते हुए अपने चुनिंदा दोस्तों से अपनी लोकेशन भी शेयर कर सकते हैं। ब्लैकबैरी के बीबीएम मैसेंजर की तरह ही जिओ यूजर को न्यूज, अपडेट और स्पेशल प्रमोशन ब्राउज करने की आजादी भी देता है। इस तरह जियो के यूजर अपने खास लोगों के बीच लगातार बने रह सकते हैं।
गौरतलब है कि एंड्रायड और दूसरे ओपरेटिंग सिस्टम्स पर चलने वाले व्हाट्स ऐप को इससे पहले भी वी-चैट, टेलीग्राम और लाईन, वाइबर और हाइप जैसे ऐप की ओर से समय-समय पर चुनौती दी गई। इसके बावजूद व्हाट्सऐप इंस्टेंट मैसेजिंग की दुनिया में टॉप पर बरकरारर है।
अरे मोदी जी! फ्रांस में पद्म भूषण शर्माजी थोड़ी बैठे हैं आपका प्लांटेड इंटरव्यू चलाने के लिए
सरकार भले ही प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अपनी फ्रांस यात्रा के दौरान रक्षा और परमाणु क्षेत्र सहित कई तरह के ‘बड़े’ द्विपक्षीय समझौते किए जाने का दम भर रही हो, पर पेरिस में मोदी महाशय की जो किरकिरी हुई उसकी ऊंचाई भी एफिल टावर से कतई कम नहीं कही जा सकती।
दरअसल सातवें आसमान पर चल रहे सत्ता के अहंकार और पालतू संपादकों को उंगलियों के इशारे पर नचाने की आदत में मोदी जी ने फ्रांस में भी कुछ ऐसा ही करने की कोशिश कर डाली। ... बस जनाब, यहीं मात खा गया इंडिया। मोदी जी ने फ्रांस के अग्रणी अखबार 'ल मॉन्द' में अपना प्री फेब्रिकेटेड और प्लांटेड इंटरव्यू छपवाने की इच्छा जाहिर की, तो खरी-खरी सुननी पड़ गई देसी तीस मार खान को। दरअसल मोदी जी शायद भूल गए कि फ्रांस उनकी टेरिटरी नहीं है, जहां वह दूरदर्शन को मोदी दर्शन बना लेंगें और आकाशवाणी पर वक्त बे वक्त मोदी के ‘मन की बात’ बात बजेगी।
मोदी जी को शायद यह भी याद नहीं रहा कि फ्रांस में भारत की तरह उनके कोई पद्म भूषण शर्मा जी नहीं बैठे हुए हैं, जो प्लांटेड इंटरव्यू चलाने और फर्जी अदालत लगाने में महारत रखते हों। सो अखबार ने न केवल मोदी जी का ऐसा इंटरव्यू छापने से इनकार कर दिया बल्कि उसके सोशल साइट पर इसका नगाड़ा पीट कर मोदी जी की दुनिया भर में खूब भद्द भी पिटवाई।
'ल मॉन्द' के दक्षिण एशियाई संवाददाता जूलियॉं बुविशॉ ने ट्विटर पर इस बात का खुलासा भी कर दिया। उन्होंने अपने ट्वीट में कहा है कि 'हमें बताया गया था कि नरेंद्र मोदी सवालों के जवाब लिखकर देंगे, न कि सामने बैठकर। इसलिए 'ल मॉन्द' ने इंटरव्यू से इनकार कर दिया।' इसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने दूसरे अखबार 'ल फिगार' से इस इंटरव्यू के लिए बात की।
इस तरह 'ल मॉन्द' ने एक तीर से दो नहीं, तीन शिकार कर दिखाए। उसने न सिर्फ मीडिया को मुट्ठी में समझने के मोद के गुरूर को उजागर किया, बल्कि पूर्वनियोजित या फिक्स इंटरव्यू छापने से इनकार करके अपनी साख को जनता के बीच और मजबूत कर लिया। इसके साथ ही उसने प्रतिद्वंद्वी अखबार 'ल फिगार' में छपे मोदी के इंटरव्यू की हकीकत भी दुनिया के सामने रख दी।
दरअसल 'ल फिगार' 'ल मॉन्द' का प्रतिद्वंद्वी अखबार होने के साथ ही उस कंपनी दसौ का अखबार है, जो भारत को 126 रफेल लड़ाकू विमान बेचने की कोशिश कर रही है।
इस तरह 'ल मॉन्द' ने एक तीर से दो नहीं, तीन शिकार कर दिखाए। उसने न सिर्फ मीडिया को मुट्ठी में समझने के मोद के गुरूर को उजागर किया, बल्कि पूर्वनियोजित या फिक्स इंटरव्यू छापने से इनकार करके अपनी साख को जनता के बीच और मजबूत कर लिया। इसके साथ ही उसने प्रतिद्वंद्वी अखबार 'ल फिगार' में छपे मोदी के इंटरव्यू की हकीकत भी दुनिया के सामने रख दी।
दरअसल 'ल फिगार' 'ल मॉन्द' का प्रतिद्वंद्वी अखबार होने के साथ ही उस कंपनी दसौ का अखबार है, जो भारत को 126 रफेल लड़ाकू विमान बेचने की कोशिश कर रही है।
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