29 March 2020

प्रिंट मीडिया के लिए भी जान बचाने की लड़ाई है करोना त्रासदी

चीन से शुरू होकर भारत आ पहुंची करोना की त्रासदी ने जहां लोगों की जान मुश्किल में डाल दी है, वहीं इसके आर्थिक दुष्‍प्रभाव भी काफी गंभीर होने जा रहे हैं। करोना पर नकेल कसने के लिए देशभर में लागू किया गया लॉकडाउन देश की अर्थव्‍वस्‍था के लिए एक भारी संकट साबित होगा। सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों पर विराम के चलते कई उद्योग-धंधे तबाही के कगार पर पहुंच जाएंगे। इनमें प्रिंट मीडिया यानि समाचार-पत्र उद्योग भी शामिल है। देशव्यापी अभी लॉक-डाउन एक सप्‍ताह भी नहीं हुआ है कि प्रिंट मीडिया पर कोविड-19 की काली छाया का असर साफ नजर आने लगा है। अखबारों के पन्ने कम हुए हैं। उनका वितरण बाधित हुआ है और विज्ञापन नदारद हो गए हैं। जो अखबार 20 से 40 पेज के हुआ करते थे, वे महज 12 से 20 पेज में सिमट कर रह गए हैं। लॉकडाउन के चलते आर्थिक गतिविधियां और बाज़ार-कारोबार ठंडा होने के कारण अखबारोंं के विज्ञापनों पर भी बहुत ही बुरा असर देखने को मिल रहा है। जिन अखबारों में 40 से 60 फीसदी स्पेस विज्ञापनों से भरी रहती थी उन अखबारों में विज्ञापन महज 10 से 20 फीसदी स्पेस में सिमट गए हैं।
घरों में कैद जिन लोगों की सुबह चाय और अखबार से होती थी, वे लोग अब नेट पर ई- पेपर पढ़ने की आदत डाल रहे हैं। बहुत संभव है कि इनमें से ज्यादातर लोग लाक-डाउन की अवधि पूरी होने पर अपने पुराने अखबार पर लौटे ही नहीं।ऐसे में प्रिंट मीडिया की विज्ञापन आय तो कम होगी ही, प्रसार संख्या भी सिकुड़ जाएगी। नतीजे में पत्रकार और गैर-पत्रकार कर्मचारियों पर बड़े पैमाने पर छंटनी की तलवार लटकना लाजिमी है। अखबारों के लिए कागज-स्याही और अन्य सामग्री बनाने वाले उद्योगों पर भी इसका असर पड़ेगा ही पड़ेगा। प्रिंट मीडिया, जिसे मैं विज्ञापन उद्योग कहता रहा हूं, के इस संभावित भविष्य की कल्पना करके ही सिहरन होती है। काश, यह कल्पना गलत साबित हो और चार दशक तक मेरी आजीविका का साधन रहा प्रिंट मीडिया इस गहरे संकट से उबर सके। करोना संकट के बीच अखबारों की बिक्री को तगड़ा झटका लगने के पीछे एक बड़ी वजह लोगों के मन में बैठी यह धारणा भी है कि अखबार के जरिये उनके घर में वायरस आ सकता है। हालांकि अखबार लगातार डब्‍लूएचओ के हवाले से यह खबर छाप रहे हैं कि अखबार के जरिये कोरोना का संक्रमण नहीं फैलता, पर लोगों को इसपर यकीन नहीं हो रहा। ि‍लिहाज़ा लोग अखबारों से दूरी बनाते जा रहे हैं। बहुत से अपार्टमेंटों में तो अखबार वालों के प्रवेश पर ही रोक लगा दी गई है। ऐसे में जो लोग चाहते हैं, उन्‍हें भी इन दिनों अखबार नहीं मिल पा रहा है।

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