01 September 2015

एक औरंगजेब मिटा रहा दूसरे का नाम

चित्र इमनॉमिक टाइम्स से साभार
इतिहास एक रोचक मोड़ पर खड़ा है। एक औरंगजेब दूसरे का नामोनिशां मिटाता नजर आ रहा है। ‘श्रद्धां‌जलि’ के सहारे तारीख की एक नई इबारत लिखने की यह कवायद जाहिर तौर पर देश में एक बहस और कई सवाल खड़े कर रही है। पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तर्क और तकाज़े हो सकते हैं, पर पूरे प्रकरण में सबसे अफसोसनाक यह है कि दुनिया से विदा हो चुके जिस नेकदिल इंसान के नाम पर नफरत का यह खेल खेला जा रहा है, वह धर्म या मजहब की दीवारों के पार सबको प्रिय था, हर दिल अजीज था। कट्टरता जिस कलाम को कभी छू न सकी, उसके नाम पर किया जा रहा यह कारनामा यकीनी तौर पर श्रद्धांजलि की श्रेणी में तो नहीं रखा जा सकता।

कहीं न कहीं इससे उस ऊंचे नाम की छीछालेदर होती ही दिखाई दे रही है। जी हॉ, बात औरंगजेब रोड का नाम बदल कर डा. कलाम के नाम पर किए जाने की ही हो रही है। दुनिया का इतिहास गवाह है कि कोई नया और बड़ा काम किए बिना महज फितूर भरी हरकतों के सहारे इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने की हसरत अकसर इंसान को सनकीपन और तानाशाही के कगार पर ला खड़ा करती है। जर्मनी में हिटलर, इटली में मुसोलिनी, रूस में स्टालिन और जापान में टोजो दशकों पहले ऐसे नजारे दुनिया को दिखा चुके हैं और कालांतर में यह दृश्य अब भारत में उभरता नजर आ रहा है। एक सड़क का नाम बदले जाने पर ऐसी तुलना फौरी तौर पर अतिवाद लग सकती है, पर डेढ़ साल में की गई कारगुजारियों पर नजर डालिए तो नफरत की सियासत का यह सफर बड़े सिलसिलेवार ढंग से आगे बढ़ता नजर आ जाएगा। इंदिरा आवास योजना, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना और यहां तक कि नेहरू की सोच से उपजे योजना आयोग पर भी हुजूर कुछ इसी तरह के नजर ए इनायत कर चुके हैं।

इस दिमागी दिवालियेपन की इस प्रवृत्ति पर तरस और हंसी आती है, जब योजना आयोग की जगह रातो रात एक नई संस्‍था नीति आयोग खड़ी कर दी गई और ‘नीति’ शब्द का एक अंट-शंट टाइप फुल फार्म भी गढ़ दिया गया। जरा गौर कीजिए इस पर नीति आयोग के ‘नीति’ का फुलफार्म है नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफार्मिंग इंडिया। नाम में इंस्टीट्यूट और आयोग दोनों शब्दों का होना अपने आप में हास्यास्पद है। दुनिया में ऐसी कोई दूसरी संस्‍था हमने तो नहीं देखी जो इंस्टीट्यूट भी हो और आयोग भी। आपको नजर आए तो जरा गूगल पर खोज कर हमें भी दिखा दीजिए। इसके अलावा इस नामावली में अंग्रेजी शब्दों पर सवार होकर एक हिन्दी शब्द को जस्टीफाई करने की दुश्चेष्टा साफ-साफ नजर आती है और हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्‍थान का नारा लगा कर प्रखर राष्टवाद का दम भरने वाले यहां भारत के लिए इंडिया शब्द का इस्तेमाल करते नजर आ रहे हैं। विरोधाभास देखिए जरा, दूसरों की डीएनए रिपोर्ट जारी करने वाले महाशय ने किस तरह से अपना डीएनए बदल दिया है यहां।

बहरहाल, चर्चा को एक बार फिर से औरंगजेब रोड पर लगाई जा रही डा. कलाम के नाम की तख्ती पर लाएं तो पहला सवाल जहन में यही उठता है कि कलाम जैसे सर्वप्रिय व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करने का क्या सिर्फ यही तरीका था। क्या किसी जगह का नाम बदल कर ही देश की राजधानी में उनका नाम उकेरा जा सकता था और अगर नाम बदलना ही था तो सरकार को राजपथ या रायसीना रोड क्यों नहीं नजर आई। देश में राजतंत्र तो आजादी के साथ्‍ा ही खत्म हो चुका है, तो फिर राजपथ क्यों? रायसीना रोड को भी डा. कलाम का नाम देना एक बेहतर विकल्प हो सकता था, क्योंकि जिस राष्ट्रपति भवन में वह रहे वह रायसीना हिल्स पर ही स्थित है। सड़कों से जरा हटकर देखें तो राजधानी दिल्ली में ही नेशनल साइंस सेंटर भी स्थित है। वैज्ञानिक से राष्ट्रपति बने डा. कलाम का नाम अगर इस म्यूजियम को दिया जाता तो क्या यह उनकी शख्सीयत और उपलब्धियों के लिहाज से ज्यादा उपयुक्त नहीं होता?

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