31 March 2015

रोजगार के मौकों के मामले में भारत कई देशों से बेहतर


हकीकत की जमीन पर हमें देश में भले, गरीबी और बेरोजगारी एक विकराल समस्या के रूप में दिखती है, पर ऑनलाइन सर्वे कुछ अलग ही तस्वीर पेश करते हैं। एक ऑनलाइन सर्वेक्षण के मुताबिक रोजगार के मामले में इस वक्त भारत ‌की स्थिति दुनिया में काफी बेहतर है। यही नहीं, अमेरिकन एक्सप्रेस और सीएफओ रिसर्च के साझा सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि अगले कुछ महीनों में भी अन्य देश के मुकाबले भारत में रोजगार वृद्धि का प्रतिशत बेहतर रहेगा।
सर्वे के अनुसार 78 फीसदी कारोबारी भारत में रोजगार संभावनाओं में मजबूत वृद्धि की उम्मीद करते हैं, इसके मुकाबले चीन के 50 फीसदी और अमेरिका के 61 फीसदी वित्तीय पेशेवरों को रोजगार वृद्धि की उम्मीद है। सर्वे में शामिल भारत के 72 फीसदी वित्तीय कारोबारियों का कहना है कि रोजगार के नए अवसर पैदा होने से देश में रोजगार की स्थिति सुधरेगी। मौजूदा कारोबारों में वृद्धि होने से भी रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
अमेरिकन एक्सप्रेस की कंट्री हेड सारु कौशल के मुताबिकआर्थिक परिदृश्य के मामले में भारत उन देशों में सबसे आगे है जहां रोजगार बढ़ने की संभावना नजर आ रही है। हालांकि सर्वेक्षण में कुशल श्रमिकों की कमी की बात भी कही गई है। सर्वेक्षण में अपनी राय देने वाले  58 फीसदी लोगों का मानना है कि तकनीक में सुधार से भी भारत के रोजगार बाजार पर सकारात्मक प्रभाव दिख सकता है। सर्वेक्षण में  44 फीसदी भारतीय वित्तीय क्षेत्र के दिग्गजों का मानना है कि कर्मचारियों की बढ़ती संतुष्टि भी एक अहम मुद्दा है। इसी तरह 29 फीसदी लोगों के मुताबिक उनकी कंपनियों में कर्मचारियों की संख्या उनकी कमाई के मुकाबले तेजी से बढ़ी है जबकि 48 फीसदी लोगों का कहना है कि ये दोनों चीजें समान गति से बढ़ रही हैं। सर्वे से एक ओर जहां भारत के रोजगार बाजार में उभरती आशाएं जाहिर हुईं हैं वहीं कंपनियों के भीतर निर्णय लेने की प्रक्त्रिस्या में वित्तीय क्षेत्र के पेशेवरों की भूमिका के बारे में भी कुछ सूचनाएं दी गई हैं।

मोदी जी! रजत बाबू को सीधे-सीधे भारत रत्न क्यों नहीं थमा देते


पद्म और भारत रत्न पुरस्कार प्रदान किए जाने के लिए राष्ट्रपति भवन के दरबार हाल में आयोजित पारंपरिक समारोह में कल टीवी एंकर और पत्रकार रजत शर्मा को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। रजत को यह पुरस्कार शिक्षा और साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया गया। यह जानकर मन में जिज्ञासा हुई कि रजत बाबू के कभी किसी शैक्षणिक गतिविधि में संलग्न होने के बारे में तो सुना नहीं और न ही उनकी किसी किताब, कविता, कहानी या अन्य कोई साहित्यिक रचना के बारे में कभी सुना, ...तो फिर शिक्षा और साहित्य में योगदान के लिए इतना बड़ा पुरस्कार??? मन में सहज ही सवाल उठा और यह उत्कंठा तत्काल मुझे ले गई सर्वज्ञानी गूगल बाबा की शरण में। तरह-तरह के कई की वर्ड मार कर काफी देर तक खंगाल डाला दुनिया में सबसे ज्यादा दक्ष माने जाने वाले इस सर्च इंजन को, पर गूगल बाबा भी गुगली खा गए रजत बाबू के मामले में। शिक्षा या साहित्य में उनका कोई योगदान नहीं दिखा पाए मुझे। अतबत्ता उनकी बायोग्राफी, बैकग्राउंड पर कई तरह के मैटर जरूर दिखे।
‘महानुभाव’ की जीवन गाथा जानने के ‌लिए रिजल्ट में दिख रहे विकीपीडिया के पेज पर झट से जा पहुंचा। इसमें उनके व्यक्तिगत जीवन, पत्नी ऋतु धवन के उल्लेख के साथ कंट्रोवर्सीज यानी कि शर्मा जी से जुड़े विवादों का भी एक शीर्षक दिखा जिसके तहत दी गई जानकारी के मुताबिक उनका नाम इंडिया टीवी की रिपोर्टर रही तनु शर्मा की खुदकुशी के मामले में भी आया था। लिखा था कि इससे मीडिया के पावर के मिसयूज को लेकर उस वक्त विवाद खड़ा हुआ था। रजत शर्मा द्वारा तनु को जून 2014 में इस संबंध में लीगल नोटिस भेजे जाने का जिक्र भी था। अन्य विवादों में भड़ास4मीडिया साइट चलाने वाले यशवंत सिंह को भी लीगल नोटिस भेजने का जिक्र था।
इसके अलावा गूगल पर विवादों की पड़ताल करने पर रजत शर्मा द्वारा इंडिया टीवी पर नरेंद्र मोदी के ‌‘फिक्‍स्ड’ और ‘ओवर स्क्रिप्टेड’ इंटरव्यू चलाने के चलते कमर वाहिद नकवी द्वारा इंडिया टीवी से इस्तीफा दिए जाने की खबर भी दिखी। हालिया बात होने के कारण याद आ गया चुनाव की बेला में शर्मा जी के चैनल पर बार-बार चलाया गया मोदी का यह ‘करामाती’ इंटरव्यू। खूब ‘माहौल’ बना था इससे उस वक्त। वैसे मेरे ‘खुराफाती’ दिमाग ने पता नहीं क्यों उस वक्त ही यह सोचने की धृष्टता कर ली थी कि मोदी सरकार में आए, तो रजत बाबू की तो बल्ले-बल्ले। कोई बड़ा पद और पुरस्कार जरूर मिलेगा। अब इसे सेटिंग-गेटिंग समझ लीजिए या विधि का विधान। हुआ भी ठीक ऐसा ही। रजत बाबू को सरकार की ओर से ‌गठित किसी कमेटी या ग्रुप (नाम याद नहीं आ रहा) की कमान सौंपे जाने की खबर आई थी पिछले दिनों। तकरीबन उसके साथ ही उन्हें पद्म भूषण दिए जाने की घोषणा हुई। वहीं सरकार ने ग्लोबल स्तर पर पहचान बनाने वाले भारत के पहले कॉमिक कैरेक्टर चाचा चौधरी को जन्म देने वाले कार्टूनिस्ट प्राण को मरणोपरांत महज पद्म श्री देकर निपटा दिया।
इन बातों और विवादों में कौन सच्चा, कौन झूठा है इस बहस में मैं नहीं पड़ना चाहता। मेरी तो बस इतनी सी अर्ज है कि मोदी और जेटली को शर्मा जी से यारी ही निभानी थी, तो जरा सलीके से निभा लेते। इस साल पद्म श्री दे देते, अगले साल पद्म भूषण फिर पद्म विभूषण और फिर भारत रत्न दे देते। अभी तो चार साल से भी ज्यादा वक्त पड़ा है। पर यारों ने शायद सोचा होगा कि भई ‘कल हो न हो’। अरे भइया तो फिर डायरेक्ट भारत रत्न ही दे डालते शर्मा जी को। कितनी मेहनत करते हैं बेचारे प्लांटेड इंटरव्यू को नेचुरल और स्पांटिन्युअस दिखाने के लिए। इस कला में भला है कोई जोड़ उनका?

'आयुष्मान भारत' में मिलेगी सेहत से जुड़ी जानकारी


सरकारी टीवी चैनल दूरदर्शन आयुष मंत्रालय के साथ मिलकर एक नया साप्ताहिक कार्यक्रम शुरू करने जा रहा है। सेहत से जुड़े इस कार्यक्रम का नाम 'आयुष्मान भारत' रखा गया है। यह आधे घंटे का होगा और इसमें चिकित्सा की प्राचीनतम पद्धतियों की जानकारी देते हुए इनपर चर्चा की जाएगी।कार्यक्रम का पहला एपिसोड 28 मार्च, 2015 को शाम 6 बजे प्रसारित किया जाएगा।
कार्यक्रम की पहली कड़ी में केंद्रीय आयुष मंत्री श्रीपद नाइक लोगों को अपने मंत्रालय की जन कल्‍याण योजनाओं से रूबरू कराएंगे। कार्यक्रम का सीधा प्रसारण डीडी नेशनल और नौ अन्य क्षेत्रीय केंद्रों द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं में किया जाएगा, जिससे कि देशभर के दर्शकों के साथ बेहतर तरीके से संबंध स्थापित किया जा सके। इलाज की प्राचीनतम पद्धतियों के जरिए देश में लोगों को स्वास्थ्य के बारे में शिक्षित करने के उद्देश्य से यह कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है।
इसके साथ ही यह कार्यक्रम स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़ी विभिन्न समस्याओं के समाधान में दर्शकों की मदद करेगा। कार्यक्रम में आयुर्वेद, योग व प्राकृतिक चिकित्‍सा के साथ ही यूनानी, सिद्ध और होम्‍योपैथी के विशेषज्ञ भी लोगों को इलाज व सेहत से जुड़ी जानकारियां प्रदान करेंगे। दर्शक सीधे फोन कॉल के जरिए विशेषज्ञों अपनी समस्याओं का समाधान भी प्राप्त कर सकेंगे। इस तरह दूरदर्शन का यह शो चिकित्सकों को दर्शकों से सीधे तौर पर मुखातिब कराएगा। कार्यक्रम के बारे में दूरदर्शन का कहना है कि इस तरह के कार्यक्रमों से भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा होगी। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति को दोबारा से प्रचलन में लाने के उद्देश्य से  नवंबर 2014 में आयुष विभाग को एक स्वतंत्र मंत्रालय बना दिया था।

13.9 फीसदी की दर से बढ़ेगा भारतीय मीडिया व मनोरंजन उद्योग


तेजी से विस्तार करते भारतीय मीडिया और मनोरंजन की रफ्तार आने वाले कुछ सालों में और भी तेजी पकड़ेगी। यह अनुमान रिसर्च फर्म केपीएमजी के एक ताजा अध्ययन में जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक देश का मीडिया व मनोरंजन उद्योग 2019 तक 13.9 फीसदी की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़त दर्ज करते हुए 1,964 अरब रुपये तक पहुंच जाएगा। केपीएमजी की रिपोर्ट ने अपनी रिपोर्ट उद्योग संगठन फिक्की के सालाना मीडिया सम्मेलन फिक्की फ्रेम्स में जारी की है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2014 में यह उद्योग 1000 अरब रुपये की दहलीज पार करके 1026 अरब रुपये पर पहले ही पहुंच चुका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते साल इस सेक्टर में कार्यरत कंपनियों की विज्ञापन आय में अच्छी बढ़त हुई है। कंपनियों की आय में हुए इस इजाफे की वजह है राष्ट्रीय और राज्यों के चुनावों के दौरान प्रचार-प्रसार के लिए किया गया भारी खर्च है। इसके अलावा हाल के दिनों में ई-कॉमर्स कंपनियों ने भी अपने प्रचार और विज्ञापनों पर काफी बड़ी रकम खर्च की है।

वीडियोकॉन डी2एच बनी नेस्डैक में मूल्यवान भारतीय कंपनी


टीवी प्रसारण के कारोबार से जुड़ी और डायरेक्ट टू होम सेवा देने वाली कंपनी वीडियोकॉन डी2एच को अमेरिकी शेयर बाजार नेस्डैक में मूल्यवान भारतीय कंपनी का दर्जा मिल गया है। प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) की प्रक्रिया पूरी करने के साथ ही कंपनी नेस्डैक में सूचीबद्ध हो गई है। इश्यू के तहत कंपनी ने 32.5 करोड़ डॉलर के अमेरिकन डिपॉजिटरी रेसिप्ट (एडीआर) जारी किए हैं। कंपनी की पूंजी  इसके साथ ही 1.15 अरब डॉलर पर पहुंच गई है।
वीडियोकॉन डी2एच ने नेस्डैक में सबसे ज्यादा पूंजी वाली कंपनी बनने के साथ ही कई उपलब्धियां हासिल की हैं। किसी विदेशी स्टॉक एक्सचेंज में वर्ष 2000 के बाद यह सूचीबद्ध होने वाली पहली कंपनी है। इसके साथ ही अमेरिकी बाजार में 2007 के बाद किसी भारतीय कंपनी का सबसे बड़ा आईपीओ लाने का सेहरा भी इसके ही सिर पर है। कंपनी के एमडी सौरभ धूत ने इसे एक बड़ी उपलब्धि बताया है। उन्होंने कहा कि यह वीडियोकॉन डी2एच के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय मीडिया उद्योग के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि यह हमारे ब्रांड में ग्राहकों के लगातार बढ़ते भरोसे को भी दर्शाता है।

अमर उजाला ने भी पकड़ी शेयर बाजार की राह


दैनिक जागरण, भास्कर और हिन्दुस्तान के बाद अब एक और हिन्दी अखबार पूंजी बाजार में उतरने वाला है। अमर उजाला पब्लिकेशंस बाजार में अपना आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) लाने की तैयारी में है। कंपनी ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के पास इसके लिए कागजात भी दाखिल कर दिए हैं।
सेबी को अमर उजाला की ओर से सौंपे गए प्रस्ताव के मुताबिक आईपीओ के तहत कंपनी 50 करोड़ रुपये के 26.90 लाख इक्विटी शेयर बेचेगी। जिन शेयरधारकों के शेयरों के शेयर आईपीओ के जरिए बेचे जाएंगे उनमें कंपनी के प्रबंध निदेशक राजुल महेश्वरी, स्नेहलता महेश्वरी और पुन अंडरटेकिंग्स नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं।
आईपीओ से मिली रकम का इस्तेमाल कंपनी प्रिंटिंग मशीनें व होर्डिंग आदि खरीदने, अपनी सहायक कंपनियों में निवेश करने और अन्य कॉरपोरेट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करेगी। आईपीओ के प्रबंधन का जिम्मा  कंपनी ने एक्सिस कैपिटल और आईडीएफसी को सौंपा है। गौरतलब है कि जनवरी से अब तक सेबी के पास आईपीओ के लिए यह सातवां प्रस्ताव आया है। इससे पहले एजीएस ट्रांसेक्ट टेक्नॉलजीस, एसएच हेल्कर एंड कंपनी, श्री शुभम लॉजिस्टिक्स, प्रेसिसियन कैमशॉफ्ट्स, पेन्नार इंजीनियर्ड बिल्डिंग सिस्टम्स और एसएसआईपीएल रिटेल अपने आईपीओ प्रस्ताव सेबी को सौंप चुकी हैं।

मोदी जी! सीधे भारत रत्न ही दे देते रजत बाबू को

पद्म और भारत रत्न पुरस्कार प्रदान किए जाने के लिए राष्ट्रपति भवन के दरबार हाल में आयोजित पारंपरिक समारोह में कल टीवी एंकर और पत्रकार रजत शर्मा को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। रजत को यह पुरस्कार शिक्षा और साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया गया। यह जानकर मन में जिज्ञासा हुई कि रजत बाबू के कभी किसी शैक्षणिक गतिविधि में संलग्न होने के बारे में तो सुना नहीं और न ही उनकी किसी किताब, कविता, कहानी या अन्य कोई साहित्यिक रचना के बारे में कभी सुना, ...तो फिर शिक्षा और साहित्य में योगदान के लिए इतना बड़ा पुरस्कार कैसे ??? मन में सहज ही सवाल उठा और यह उत्कंठा तत्काल मुझे ले गई सर्वज्ञानी गूगल बाबा की शरण में। तरह-तरह के कई की वर्ड मार कर काफी देर तक खंगाल डाला दुनिया में सबसे ज्यादा दक्ष माने जाने वाले इस सर्च इंजन पर, गूगल बाबा भी गुगली खा गए रजत बाबू के मामले में। शिक्षा या साहित्य में उनका कोई योगदान नहीं दिखा पाए मुझे। अतबत्ता उनकी बायोग्राफी, बैकग्राउंड पर कई तरह के मैटर जरूर दिखे।
‘महानुभाव’ की जीवन गाथा जानने के ‌लिए रिजल्ट में दिख रहे विकीपीडिया के पेज पर झट से जा पहुंचा। इसमें उनके व्यक्तिगत जीवन, पत्नी ऋतु धवन के उल्लेख के साथ कंट्रोवर्सीज यानी कि शर्मा जी से जुड़े विवादों का भी एक शीर्षक दिखा जिसके तहत दी गई जानकारी के मुताबिक उनका नाम इंडिया टीवी की रिपोर्टर रही तनु शर्मा की खुदकुशी के मामले में भी आया था। लिखा था कि इससे मीडिया के पावर के मिसयूज को लेकर उस वक्त विवाद खड़ा हुआ था। रजत शर्मा द्वारा तनु को जून 2014 में इस संबंध में लीगल नोटिस भेजे जाने का जिक्र भी था। अन्य विवादों में भड़ास4मीडिया साइट चलाने वाले यशवंत सिंह को भी लीगल नोटिस भेजने का जिक्र था।
इसके अलावा गूगल पर विवादों की पड़ताल करने पर रजत शर्मा द्वारा इंडिया टीवी पर नरेंद्र मोदी के ‌‘फिक्‍स्ड’ और ‘ओवर स्क्रिप्टेड’ इंटरव्यू चलाने के चलते कमर वाहिद नकवी द्वारा इंडिया टीवी से इस्तीफा दिए जाने की खबर भी दिखी। हालिया बात होने के कारण याद आ गया चुनाव की बेला में शर्मा जी के चैनल पर बार-बार चलाया गया मोदी का यह ‘करामाती’ इंटरव्यू। खूब ‘माहौल’ बना था इससे उस वक्त। वैसे मेरे ‘खुराफाती’ दिमाग ने पता नहीं क्यों उस वक्त ही यह सोचने की धृष्टता कर ली थी कि मोदी सरकार में आए तो रजत बाबू की तो बल्ले-बल्ले। कोई बड़ा पद और पुरस्कार जरूर मिलेगी। अब इसे सेटिंग-गेटिंग समझ लीजिए या विधि का विधान। हुआ भी ठीक ऐसा ही। रजत बाबू को सरकार की ओर से ‌गठित किसी कमेटी या ग्रुप (नाम याद नहीं आ रहा) में शामिल करने की खबर आई थी पिछले दिनों और तकरीबन उसके साथ ही उन्हें पद्म भूषण दिए जाने की घोषणा हुई। वहीं सरकार ने ग्लोबल स्तर पर पहचान बनाने वाले भारत के पहले कॉमिक कैरेक्टर को जन्म देने वाले कार्टूनिस्ट प्राण को मरणोपरांत महज पद्म श्री देकर निपटा दिया।
इन बातों और विवादों में कौन सच्चा, कौन झूठा है इस बहस में मैं नहीं पड़ना चाहता। मेरी तो बस इतनी सी अर्ज है कि मोदी और जेटली को शर्मा की से यारी निभानी थी तो जरा सलीके से निभा लेते। इस साल पद्म श्री दे देते और बाद में पद्म भूषण, पद्म विभूषण और फिर भारत रत्न ही दे देते। अभी तो चार साल से भी ज्यादा वक्त पड़ा है। पर यारों ने शायद सोचा होगा कि भई ‘कल हो न हो’। अरे भइया तो फिर डायरेक्ट भारत रत्न ही दे डालते ना शर्मा जी को। कितनी मेहनत करते हैं बेचारे प्लांटेड इंटरव्यू को नेचुरल और स्पांटिन्युअस दिखाने के लिए। इस कला में भला है कोई जोड़ उनका?

30 March 2015

‘स्लमडॉग मिलेनियर’ के कहानीकार विकास स्वरूप बने विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता

जय हो...
चार साल पहले करीब दर्जन भर ऑस्कर पुरस्कार पाने वाली फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ की कहानी रचने वाले वरिष्ठ राजनयिक और मशहूर लेखक विकास स्वरूप को विदेश मंत्रालय में प्रवक्ता नियुक्त किया गया है। वह 18 अप्रैल को नया पद ग्रहण करेंगे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता पद पर वह सैयद अकबरुद्दीन की जगह लेंगे। पिछले तीन साल से सैयद अकबरुद्दीन प्रवक्ता की भूमिका निभा रहे थे। यह जानकारी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में दी गई है।
गौरतलब है कि स्लमडॉग मिलेनियर फिल्म स्वरूप के उपन्यास 'क्यूएंडए' पर ही आधारित थी। स्वरूप 1986 बैच के आईएफएस अधिकारी हैं। वह अक्तूबर में आयोजित होने वाली भारत-अफ्रीका शिखर बैठक में अहम भूमिका निभाएंगे। स्वरूप फिलहाल विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव, संयुक्त राष्ट्र-राजनीतिक के रूप में काम कर रहे हैं। विकास स्वरूप पहली बार चर्चा में उस समय आए थे जब ‘जय हो’ का संगीत रचने के लिए ऑस्कर जीत कर एआर रहमान यह पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय बने थे। इसलिए स्वरूप की कहानी पर आधारित ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ को भारतीय फिल्म जगत के इतिहास में एक अहम मुकाम मिला हुआ है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में जन्मे विकास स्वरूप वकीलों के परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इतिहास, दर्शन शास्त्र और मनोविज्ञान में डिग्री हासिल की है। क्यूएंडए उनका पहला ही उपन्यास था जो उन्हें सुर्खियों में ले आया था क्योंकि इसका अनुवाद तीन दर्जन से ज्यादा भाषाओं में हुआ था। इसके बाद इसी पुस्तक पर स्लमडॉग मिलेनियर फिल्म बनी जिसने सन 2004 में 11 ऑस्कर अवॉर्ड जीते थे।

पहली बार किसी महिला के हाथ आई गार्जियन की कमान

करीब दो शताब्दियों का सफर कर चुके प्रतिष्ठित ब्रिटिश अख़बार गार्जियन की कमान पहली बार एक महिला पत्रकार के हाथों में सौंपी गई है। कैथरीन वेनर को अखबार का नया मुख्य संपादक नियुक्त किया गया है। उन्होंने 20 साल तक मुख्य संपादक के पद पर रहे एलन रसब्रिजर का स्थान लिया है। कैथरीन इससे पहले वह इसी अखबार में उप-मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत थीं। वह अपना नया कार्यभार जल्द ही संभालेंगी।
गार्जियन के शीर्ष संपादकीय पद पर नियुक्ति पर खुशी जताते हुए कैथरीन ने कहा कि गार्जियन का मुख्य-संपादक बनना एक बड़ा सम्मान है। इसके साथ ही ज़िम्मेदारी भी बड़ी है, क्योंकि इस पद पर रहते हुए आपको प्रथम श्रेणी के पत्रकारों की एक ऐसी टीम का नेतृत्व करना होता है जो अपनी रिपोर्टिंग, स्वतंत्र सोच, गहन विश्लेषण और पेशेवर गुणवत्ता के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। गौरतलब है कि कैथरीन वेनर गार्जियन के 194 साला इतिहास में पहली महिला हैं, जो इसकी मुख्य संपादक बन सकी हैं। वह इस अख़बार की 12-वीं मुख्य संपादक हैं। इससे पता चलता है कि भारत ही नहीं विकसित देशों की श्रेणी में आने वाले ब्रिटेन में भी महिलाओं का किसी बड़े पद पर पहुंच पाना अपने आप में खबर होता है।

तरक्की का यह कैसा नया नजरिया दिखा रहा हिन्दुस्तान


तरक्की को चाहिए नया नजरिया का नारा बुलंद करने वाला अखबार वाकई एक हिन्दी जगत में एक नई ही कलाकारी की शुरुआत कर रहा है। खबर है कि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश से बचने के लिए संस्‍थान अब एडिटर यानी संपादक का पद खत्म कर उसकी जगह क्रिएटर और प्रोड्यूसर जैसे शब्द इस्तेमाल करने जा रहा है। सूचना के मुताबिक हिंदुस्तान प्रबंधन ने यह तय किया है कि किसी भी पद के लिए एडिटर या उससे जुड़े शब्द जैसे सब-एडिटर, सीनियर सब-एडिटर, चीफ सब-एडिटर, न्यूज एडिटर आदि पदनामों का इस्तेमाल नहीं करेगा। इसकी जगह अब क्रिएटर और प्रोड्यूसर जैसे शब्द चलाए जाएंगे। रिपोर्टरों के लिए क्रिएटर और डेस्ककर्मियों के पदनाम में प्रोड्यूसर शब्द जोड़ा जाएगा।
 
... हां जी कोर्ट को गच्चा देने की पूरी तैयारी है।
मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें लागू करने से बचने की कवायद में प्रिंट मीडिया संस्थान आए दिन रोज नए नए तरीके इजाद कर रहे हैं। कद्दावर संपादक शशि शेखर की अगुवाई वाला हिन्दुस्तान भी अब इस कतार में शामिल हो गया है। सूचना के मुताबिक कंपनी प्रबंधन ने एक शातिरपन यह भी दिखाया है कि पुराने लोग जिनको कंपनी में आए अभी तीन साल नहीं हुए हैं उनके पदनाम में कोई छेड़छाड़ नहीं की जा रही है। तय हुआ है कि संस्‍थान में जितनी भी नई नियुक्तियां होंगी नए डेजिग्नेशन के साथ भर्ती किया जाएगा। इसके अलावा तीन साल बाद कांट्रेक्ट के रिन्यूअल के समय पहले से कार्यरत कर्मचारियों का डेजिग्नेशन बदल दिया जाएगा। इन कर्मचारियों पर प्रबंधन की ओर से उस वक्त दबाव बनाया जाएगा कि नए पदनाम को स्वीकार करें अन्यथा रिन्यूअल नहीं होगा। गौरतलब है कि हिन्दुस्तान में नियुक्तियों की मौजूदा व्यवस्‍था के तहत कर्मचारियों की सेवा अवधि तीन साल की है उसके बाद कंपनी यदि कांट्रेक्ट रिन्यू करती है तो नौकर बरकरार रहती है, नहीं तो सेवा समाप्त। ऐसे में देखना होगा कि रिन्यूअल के समय कर्मचारी नए पदनाम को स्वीकार करते है या फिर प्रबंधन की इस कलाकारी के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं।

कहीं तो बख्‍श दो विज्ञापन वालों

 कुछ दिन पुरानी एक और बात याद आ गई । कुछ महीनों पहले एक कंपनी ने जेंट्स यूरीनल के लिए ऐसा कमोड बनाया जिसकी आकृति महिला के खुले हुए मुंह की तरह थी । किसी सिनेमा के टायलेट में लगे इस कमोड के उपयोग का एक फोटो भी देखा था किसी साइट पर । आदमी कर रहा था मुंह के आकार वाले उस कमोड में पेशाब । देखकर अजीब सा लगा । चटख लाल लिप्टिक से सजे ओठ, चांदी से चमकते दांत वाला मुंह खुला हुआ और लघुशंका करता आदमी । कैसी सोच है यह । क्या मानसिकता है । आदमी के अंदर के रावण को जगा रहे हो, सैटिस्फाई कर रहे हो, महज छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए । सामान बेचने, कारोबार बढ़ाने और पैसा कमाने के लिए किस हद तक जाएंगे हम । क्या इसकी कोई हद नहीं । कहीं न कहीं तो हमें एक दायरा तय करना होगा कि बस यहीं तक, इसके आगे नहीं । पर इस आत्मनिर्धारण को कोई तैयार नहीं दिख रहा है आज । धारा तो इसके विपरीत ही बहती नजर आ रही है । टायलेट में पेपर पर कल हमने लिखा कि ‘कहीं तो बख्श दो यार’ । कमेंट आया कमआन कौस्तुभ यह तो महज एक तरीका है प्रचार का । किसी पर बाध्यता नहीं है पेपर पढ़ने की । जिसकी मर्जी हो पढ़े, मर्जी न हो न पढ़े । दोनों विकल्प खुले हैं । हमारा कहना है कि दोनों विकल्प खोल कर आप कौन सा अहसान कर रहे हो, कौन सी दरियादिली दिखा रहे हो भाई । विज्ञापन में देखने न देखने के विकल्प तो यूं भी खुले ही रहते हैं । मर्जी है तो देखा नहीं तो पन्ना पलट दिया, चैनल बदल दिया । तो यह ‘विकल्प’ कोई आप दान में नहीं दे रहे हैं दानवीर कर्ण की तरह । यह तो हर आदमी के पास पहले से ही है । असल बात फिर वही है कि प्रचार के लिए कहां-कहां घुसते फिरेंगे आप, शौचालय तक ! भई हमें तो नहीं जमता यह सब।

पिछले दरवाजे से निकल लो समाचार वालों

 दिल्ली की भीड़ भरी लोकल बसों में सफर करना यूं तो अपने आप में एक यातना है, पर यह यातना भी कई तरह के अनुभव दे जाती है। इनमें से एक मजा है कंडेक्टरों की बोली और चुहलबाजी का। कभी-कभी सोचता हूं कि जाने कब नजर पडे़गी ललित कला अकादमी वालों की, इन कलाकारों की कलाकारी पर। हर स्टॉप पर खिड़की से सिर निकाल कर सवारियों को रिझा कर अपनी बस में चढ़ाने के लिए तरह-तरह के खटकर्म करते हैं बेचारे। पूरी सुर-लय-ताल में स्टेशनों के नाम एक सांस में ले जाते हैं बेचारे। इसमें भी मिनट-मिनट पर जुगलबंदी हो जाती है। एक सांस में जो जितने ज्यादा स्टाॅपेजों के नाम लेता है वही चैंपियन। जगहों के इन आड़े-तिरछे नामों को एक लय में लपेट कर झट से उगल देना वाकई आसान नहीं। यकीन न आए तो कभी आजमा कर देख लीजिए अकेले में। कलापक्ष के बाद बात करें इनकी चुहलबाजी की तो वह भी लाजवाब है जनाब। स्टॉपेज के पास धीमी होती बस की तरफ कोई महिला बढ़ती दिख जाए तो कंडक्टर माहाशय चिल्लाएंगे- लेडीज सवारी है आगे से ले लो। इसके विपरीत आदमी आता दिखे तो उसका डॉयलॉग होगा- जेंड्स सवारी है पीछे से लो। आगे से लो और पीछे से लो का औपचारिक मतलब तो बस के अगले गेट और पिछले गेट से होता है पर अनौपचारिक और असली मतलब क्या होता है, समझने वाले खूब समझते हैं। नोएडा के गोल चक्कर स्टॉप पर लंबा-चैडा भीमकाय सा आदमी सडक किनारे खड़ा दिखा। कंडक्टर उसे देखकर चिल्लाने लगा चिड़ियाघर-चिड़ियाघर-चिड़ियाघर, जबकि इससे पहले उसने किसी स्टॉप पर चिडियाघर का नाम नहीं लिया। चंद कदम बाद एक मोटा आदमी दिख गया तो चिल्ला पड़ा अप्पूघर-अप्पूघर-अप्पूघर। सब जानते थे कि ये बस अप्पूघर नहीं जाती, लिहाजा बस में ठहाका गूंज उठा। इसी तरह सड़क पर कुछ इठला-बलखा कर कुछ अजीब अंदाज में चलती लड़की को देख दिलफेक कंडक्टर बोला पागलखाने-पागलखाने-पागलखाने। जी हां कोई पागलखाना बस के रूट पर न होने पर भी। कंडक्टर की ये बदमाशियां यात्रियों को भी भरपूर मजा दे रही थीं। थोड़ी देर बाद एक स्टॉपेज पर उसने कुछ ऐसी बात कही जिसमें आज के दौर की एक बहुत बड़ी सच्चाई और गहरा व्यंग्य छुपा हुआ था। इस व्यंग्य का भान उसे कत्तई नहीं, था पर एक पत्रकार होने के नाते मुझे इसका अहसास हुआ। दरअसल नोएडा से दिल्ली के रास्ते में एक रिहायशी बिल्डिंग पड़ती है समाचार अपार्टमेंट। इसके नजदीक आते ही वह चिल्ला पड़ समाचार वालों दरवाजा पकड़ लो-समाचार वालों दरवाजा पकड़ लो। उसका मतजब उस स्टाॅपेज पर उतरने वालों के उठ कर दरवाजे की ओर बढ़ने से था। बिल्डिंग और नजदीक आई तो उसका डाॅयलाॅग थोड़ा बदल गया- समाचार वालों पिछले गेट से निकल लो-पिछले गेट से निकल लो। उसकी बात ने जब मेरे दिमाग में क्लिक किया तो मैंने सोचा कि वाकई जाने-अनजाने ये अनपढ़ सा आदमी मीडिया जगत की कितनी बड़ी सच्चाई बयां कर रहा है। आज अखबारों और खासकर टीवी चैनलों को देखिए तो जरा। अखबार के नाम पर चल रहे इस ’ कारोबार ’ में समाचार वाकई दरवाजा पकड़ता जा रहा है। समाचार की जगह न्यूज बुलेटिन में ’आइटम’ परोसे जा रहे हैं। और तथ्य ही सर्वोच्च है, सर्वप्रथम है का एथिक्स पढ़कर पत्रकारिता में आने वाले लोग वाकई पिछले दरवाजे से बाहर किए जा रहे हैं। बिना किसी हो-हल्ले और शोर-शराबे के। उनकी जगह बिठाए जा रहे हैं अनुप्रास में डूबी हेडिंग लगाने वाले और फिल्मी डॉयलॉग की अंदाज में स्टोरी की कॉपियां लिखने वाले पत्रकारिता के नए कर्णधार। स्क्रीन पर भी अब दांत पीस-पीस कर और वीर रस में, पूरे नाटकीय अंदाज में डॉयलाग डिलिवरी करने वालों को ही जगह मिल रही है। गंभीर चेहरे और अंदाज वाले पत्रकार लगता है मीडिया की बस के पिछले दरवाजे से पड़ाव-दर-पड़ाव उतरते जा रहे हैं। एक-एक कर खत्म होता जा रहा है उनका सफर।

29 March 2015

अब ई-लर्निंग के जरिए एडवरटाइजिंग में कैरियर बनाने का मौका

देश में तेजी से बढ़ते विज्ञापन उद्योग को देखते हुए युवाओं में एडवरटाइजिंग में कैरियर बनाने का रुझान बढ़ रहा है। मीडिया और एड सेक्टर की चमक-दमक भरी लाइफ स्टाइल और इसमें मिलने वाले अच्छे पैसे को देखते हुए भी अब लोग इसे एक बेहतर कैरियर विकल्प के रूप में देख रहे हैं। हालांकि बात जब एडवरटाइजिंग सीखने की आती है, तो हमारे देश में अच्छी साख और सुविधाओं वाले बहुत ज्यादा संस्‍थान दिखाई नहीं देते। संस्‍थानों की इस कमी को देखते हुए एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया  (एएससीआई) ने नए कई नए ई-लर्निंग कोर्स शुरू किए हैं। दूरस्‍थ शिक्षा प्रणाली के तहत शुरू किए जा रहे इन पाठ्यक्रमों के बारे में एक प्रजेंटेशन के जरिए जानकारी दी गई। जानकारी के मुताबिक पहली कंपनी है जिसे ई-लर्निंग प्रोग्राम के लिए एएससीआई की ओर से प्रमाण पत्र मिला है। प्रजेंटेशन में एएससीआई के उद्देश्‍यों और इसकी कार्यप्रणाली के बारे में भी बताया गया। ई-लर्निंग प्लेटफार्म पर इन कोर्सों की शुरुआत होने से उम्मीद की जा रही है कि विज्ञापन जगत को मांग के मुताबिक प्रशिक्षण प्राप्त पेशेवर लोग मिल सकेंगे। इससे इस सेक्टर का तेजी से विस्तार हो सकेगा। फिलहाल एडवरटाइजिंग सेक्टर उन क्षेत्रों में गिना जाता है, जहां मांग के मुताबिक कुशल कर्मचारी कंपनियों को नहीं मिल पाते।

ब्रॉडकास्टर्स को 10+2 ऐड कैप मामले में मिली मोहलत

न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) की ओर से 10+2 ऐड कैप मामले में दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल याचिका पर अदालत ने अपनी सुनवाई स्थगित 23 जुलाई तक कर दी है। कोर्ट के फैसले से ब्रॉडकास्टर्स को एक बार फिर कुछ राहत मिल गई है।
एनबीए और म्यूजिक व क्षेत्रीय चैनलों ने विज्ञापन समय सीमा नियम में संशोधन करने के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को उनके द्वारा दिए गए पपत्र के बारे में अदालत को सूचित किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि मंत्रालय नियमों में बदलाव करने पर विचार कर रहा है।  ब्रॉडकास्टर्स को इस मामले में सरकार से इसलिए उम्मीद है क्यों कि सूचना एवं प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने सरकार के इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट मीडिया में विज्ञापनों पर पाबंदी लगाने के पक्ष में न होने की बात कही थी। जेटली से पहले सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश रहे जावड़ेकर ने भी घोषणा की थी कि सरकार फ्री टू एयर (एफटीए) चैनलों को विज्ञापन समय सीमा से छूट देने पर विचार कर रही है।
हालांकि ब्रॉडकॉस्टर्स को मिली इस राहत के बावजूद याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई करने से भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) को दिया गया निरोधक अंतरिम आदेश जारी रहेगा। 21 जनवरी को अदालत ने इस मामले में सुनवाई की अगली तारीख 24 मार्च दी थी। इससे पहले 20 नवंबर को अपनी सुनवाई के दौरान कोर्ट अंतिम सुनवाई के लिए 21 जनवरी 2015 की तारीख तय की थी। गौरतलब है कि न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन, बी4यू, 9 एक्स मीडिया, टीवी विजन, सन टीवी नेटवर्क, ई24 और कलिग्नार टीवी ने ट्राई के द्वारा जारी 10+2 ऐड कैप के खिलाफ याचिका दायर की है। ट्राई ने ब्रॉडकास्टर्स के लिए एक घंटे के कार्यक्रम के दौरान 12 मिनट ऐडवरटाइजिंग प्रसारण करने की समय-सीमा निर्धारित की है, जिसमें क्वॉलिटी ऑफ सर्विस नॉर्म के तहत चैनलों द्वारा खुद प्रचार के लिए चलाए जाने वाले प्रोमो भी शामिल हैं। 6 मई 2014 को हुई सुनवाई में ट्राई ने तर्क दिया था कि कुछ के मामलों में कई ब्रॉडकास्टर्स को ऐड कैप के नियमों का उल्लंघन करते पाया गया है। कभी-कभी उन्होंने एक दिन में करीब 20 घंटे से भी ज्यादा का विज्ञापन प्रसारित किया है। ज्ञात हो कि ट्राई के वकील ने इस मामले में जल्द सुनवाई की याचिका दायर की थी।

सोशल मीडिया पर आप की ‌जमकर हो रही है फजीहत


... वो जो हम में, तुम में करार था, तुम्हें याद हो कि न याद हो...
याद कीजिए जरा दो-ढाई साल पहले का माहौल। दिल्ली के जंतर-मंतर में लोकपाल बिल के लिए अन्ना हजारे का आंदोलन किस तरह सोशल मीडिया के जरिए रातो-रात परवान चढ़ा था। इसके बाद साथ ही आंदोलन के सह उत्पाद (बाई प्रोडक्ट) के रूप में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) अचानक से फलक पर उभर आई थी।

सोशल मीडिया पर कथित रायशुमारी के जरिए ही केजरीवाल ने उस समय पार्टी के बनकर राजनीति के मैदान में उतरने और ‌देश की सियासत की सफाई का बीड़ा बड़े जोश ओ खरोश के साथ बड़े-बड़े आदर्शों का ढिंढोरा पीट कर उठाया था। अब जरा वक्त की करवट देखिए वही सोशल मीडिया आज न केवल आप के कुनबे में तेजी से हुए बिखराव का रंगमंच बना हुआ है, बल्कि केजरीवाल और उनकी ‘चांडाल चौकड़ी’ की थुक्का-फजीहत का बायस बन गया है। ट्वीटर, एफबी पर जहां केजरी गैंग खुद को सही और योगेन्द्र व प्रशांत को ‘गद्दार’ साबित करने के लिए तरह-तरह की बातें बनाता दिख रहा है, वहीं मीटिंग में पार्टी कार्य समिति बाउंसर्स को ‌बुलाने और पार्टी में अहम भूमिका निभाने वालों को एक के बाद एक दरकिनार करने को लेकर केजरी को गरियाया भी जम कर जा रहा है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शनिवार को हुई जूतम-पैजार के सोशल मीडिया पर पार्टी की काफी किरकिरी हो रही है। यूजर्स आम आदमी पार्टी और इसके नेताओं पर विभिन्न पोस्ट्स और जोक्स के जरिए तीखे कटाक्ष कर रहे हैं।

एक यूजर ने पार्टी की मीटिंग की तुलना डब्ल्यूडब्ल्यूई के पहलवानों से करते हुए रिंग में लड़ते रेसलर्स की तस्वीर अपलोड की है। किसी ने केजरीवाल का स्टिंग करने वाले कार्यकर्ता उमेश को 'सांप' बताया। इसके अलावा केजरीवाल द्वारा दोनों बार सीएम पद की शपथ लेते समय गाए गए गाने 'इंसान का इंसान से हो भाईचारा' पर कार्टून के जरिए तीखा कटाक्ष किया गया है।

कभी महाराष्ट्र में आम आदमी पार्टी की कमान संभालने वाली अंजलि दमानिया ने केजरीवाल और पार्टी पर जमकर निशाना साधा है। मीटिंग में हुई मारपीट पर अंजलि ने कटाक्ष करते हुए ट्वीट किया कि 'हमें अपनों ने निकाला, बाउंसर्स में कहां दम था, हमारी हड्डी वहीं टूटी, जहां फैट कम था।' अंजलि ने एक फोटो भी डाला है, जिसमें केजरीवाल योगेंद्र यादव को अपशब्द कहते नजर आ रहे हैं। हालांकि विवाद के बाद सोशल मीडिया पर मौजूद आम आदमी पार्टी के कई बड़े समर्थक मौन नजर आ रहे हैं।

अनुष्का के सिर फूट रहा वर्ल्ड कप से विदाई का ठीकरा

ऑस्ट्रेलिया से सेमीफाइन में हारने के बाद वर्ल्ड कप से टीम इंडिया के समर्थकों को निराशा जरूर हुई है, पर इस मायूसी को वह विराट कोहली की गर्लफ्रेंड सिने तारिका अनुष्का शर्मा पर तीखे कमेंट करके हंसी-मजाक के जरिए भुलाने की कोशिश कर रहे हैं। फेसबुक, ट्वीटर जैसी साइट्स पर विराट के खराब प्रदर्शन के लिए अनुष्का शर्मा को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। व्हाट्स ऐप मैसेंजर पर भी जमकर ऐसे मैसेज शेयर किए जा रहे हैं। अनुष्का और विराट के एक विज्ञापन पर कटाक्ष करते हुए एक मैसेज में दिखाया गया है कि अनुष्का के बुलाने पर ही विराट झटपट महज एक रन बना कर मैदान से चलते बने। अनुष्का पर यह तीखे कटाक्ष इसलिए भी कुछ ज्यादा हो रहे हैं क्योंकि अनुष्का विराट और टीम इंडिया और विराट को चीयर करने सिडनी गईं थीं।




हालांकि तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जिसमें सोशल मीडिया में अनुष्का को लेकर लोगों और मीडिया की प्रतिक्रिया के खिलाफ बॉलिवुड की हस्तियां नाराजगी जाहिर करती नजर आ रही हैं। अभिनेत्री प्रियंका


चोपड़ा, बिपाशा बासु समेत कई महिला सेलिब्रिटीज ने ट्वीट के जरिए अनुष्का के पक्ष में आवाज उठाई है। प्रियंका ने लिखा है कि अपने दोस्त को चीयर करने आई गर्लफ्रेंड पर सिर्फ इसलिए इल्जाम लगाया जा रहा है क्योंकि वो मैच देखने गईं। बहुत बुरी बात है। यह अनादर को बंद करें।बिपाशा ने भी अनुष्का का बचाव करते हुए लिखा है कि पूरा देश एक टीम का समर्थन कर सकता है। मगर किसी खिलाड़ी की गर्लफ्रेंड नहीं कर सकती है, क्या ये सही है ?  टेनिस स्टार सानिया मिर्जा ने अपने ट्वीट में लिखा है कि अनुष्का पर इल्जाम उसका माजक क्यों? क्या एक महिला सिर्फ कमजोरी बन सकती है, ताकत नहीं ? लोग उन मौकों को क्यों भूल रहे हैं जब हम जीते या जब विराट ने सेंचुरी बनाई।

अब एफएम सुन कर अच्छे दिनों का इंतजार कीजिए जनाब

बजाते रहो...
बजाते रहो...
मोदी के सरकार में आने के बाद अच्छे दिन भले ही नहीं आए, पर रेडियो जॉकी की चुहलबाजी भरी बातचीत और दमदार साउंड में नई-नई फिल्मों के गाने बैक टू बैक के दिन जल्द ही देश के कई छोटे शहरों के लोंगों के लिए भी आने वाले हैं। अच्छा ही है। अब यह लोग गाने सुन-सुन कर ज्यादा लंबे समय तक अच्छे दिनों का इंतजार कर सकेंगे।

संचार क्षेत्र की नियामक टेलीकॉम रेग्यूलेटरी अथॉरिटी आफ इंडिया यानी ट्राई ने कई नए शहरों में एफएम रेडियो चैनलों की तीसरे फेज की नीलामी के लिए सुरक्षित मूल्य (रिजर्व प्राइस) की अपनी सिफारिशें जारी कर दी हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 264  नए शहरों में एफएम शुरू करने के लिए दिसंबर में ट्राई से अपनी सिफारिशें देने को कहा था।

मार्च में दिल्‍ली में ट्राई और संबंधित पक्षो (स्टेक होल्डर्स) के बीच हुई बैठक के बाद ये सिफारिशें जारी की गई हैं। सिफारिशों के अनुसार, नए शहरों में एफ रेडियो चैनल के लिए रिजर्व प्राइस उस शहर में चैनल के मूल्‍य निर्धारण का 0.8 गुना होगा। ट्राई ने 253 नए शहरों के लिए भी रिजर्व प्राइस के बारे में अपने सुझाव दिए हैं। महाराष्‍ट्र के अमरावती के लिए 3.1 करोड़ रुपये रिजर्व प्राइस का सुझाव दिया गया है, जबकि दमन के लिए 1.24 करोड़ रुपये का सुझाव  दिया गया है।

ट्राई ने यह सुझाव भी दिया है कि फेज तीन में अन्‍य कैटेगरी के तहत सीमावर्ती इलाकों में स्थित 11  शहरों में प्रत्‍येक चैनल के लिए पांच-पांच लाख रुपये का रिजर्व प्राइस रखा जाना चाहिए। ट्राई के मुताबिक उसने रिजर्व प्राइस की गणना उस शहर की आबादी, एफएम सुनने वालों की संख्‍या और रेडियो ऑपरेटर द्वारा वहां से प्राप्‍त किए जाने वाले रेवेन्‍यू जैसी चीजों को आधार बना कर की है।

27 March 2015

नेटवर्क 18 के बोर्ड में निरुपमा राव को ‘वाइल्ड कार्ड एंट्री’


भारत की विदेश सचिव रह चुकी निरुपमा राव सीएनबीसी टीवी18, सीएनएन आईबीएन, आईबीएन7 और ईटीवी के ब्रॉडकास्टर नेटवर्क18 मीडिया एंड इनवेस्टमेंट्स लिमिटेड ने अपने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में शामिल कर लिया है।

 इस बात का खुलासा कंपनी की ओर से बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को दी गई एक नियामकीय सूचना के जरिए हुआ है। राव को इतने बड़े मीडिया समूह के बोर्ड में मिली इस वाइल्ड कार्ड एंट्री से ऊंचे ओहदे वाले सरकारी अफसरशाहों के कॉरपोरेट हाउसों से रिश्ते की बहस एक बार फिर प्रासंगिक हो गई है।

निरुपमा राव विदेश मंत्रालय की संयुक्त सचिव, प्रवक्ता भी रही हैं। वह कोलंबो, बीजिंग व वॉशिंगटन में भारतीय मिशन की अगुवाई कर चुकी हैं।

नेटवर्क18 के चेयरमैन आदिल जैनुलभाई ने निरुपमा को डिजिटल दुनिया में एक पथप्रदर्शक बताते हुए कहा कि हम अपनी रणनीतियों में उनके योगदान को लेकर काफी उत्सुक हैं।
दूसरी ओर निरुपमा राव ने भी स्वतंत्र और नॉन एक्जीक्यूटिव एडीशनल डायरेक्टर की अपनी भूमिका को लेकर उत्साहित होने की बात कही है।

गौरतलब है कि इससे पहले जनवरी में नेटवर्क18 ने मीडिया के दिग्गज एपी पारिगी को अपना ग्रुप सीईओ नियुक्त किया था।

सूचना-प्रसारण मंत्रालय के हिस्से आया वेब रत्न पुरस्कार

सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सोशल मीडिया साइटों पर सशक्त ढंग से अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए 2014 का वेब रत्न पुरस्कार दिया गया है। सोशल प्लेटफार्म पर मंत्रालय की भागीदारी बढ़ने से यूजर सूचना प्रसारण मंत्रालय से जुड़ी खबरों और गतिविधियों से जुड़ी जानकारियां हासिल कर सकते हैं। 

मंत्रालय को वेब रत्न पुरस्कार 2014 के तहत प्लेटिनम आइकन पुरस्कार से नवाजा गया है। केंद्रीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ने बुधवार को मंत्रालय को यह पुरस्कार प्रदान किया। इस मौके पर संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव आरएस शर्मा मौजूद थे।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव बिमल जुल्का की ओर से यह पुरस्कार विभाग की संयुक्त सचिव आर जया ने ग्रहण किया। पुरस्कार लेते समय उनके साथ मंत्रालय की न्यू मीडिया टीम भी मौजूद थी।

सूचना और प्रसारण मंत्रालय की वेबसाइट जीआईजीडब्ल्यू गाइडलाइन का पालन करती है। यह विभिन्न हिस्सेदारों को मंत्रालय द्वारा जारी नीतियों और निर्देशों के बारे में जानकारी तक पहुंचने में मदद करती है। वेबसाइट का अंग्रेजी के अलावा समर्पित हिन्दी संस्करण भी है। यह वेबसाइट कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम (सीएमएस) पर आधारित है।

गौरतलब है कि संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने वेब रत्न पुरस्कारों की स्थापना की है। इसके तहत ई-गवर्नेस के क्षेत्र में विभिन्न राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों की ओर से की गई पहल और चलन की पहचान की जाती है।

वेब रत्न पुरस्कार के जरिए ई-गवर्नेंस के इन्हीं प्रयासों को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाता है। व्यक्तिगत और संस्थागत प्रयासों को पुरस्कृत करने के लिए ही वेब रत्न पुरस्कार शुरू किए गए हैं। वेब रत्न पुरस्कारों की स्थापना 2009 में हुई थी।

चिरकुटों के चंगुल में हमारी हिन्दी-3


पत्र-पत्रिकाओं, संपादकों, लेखकों की करनी-धरनी के बाद बात करते हैं पुरस्कारों की । इस मामले में तो हिन्दी में चिरकुटई चरम पर नजर आती है । पुरस्कारों के लिए दिल्ली में कैसी-कैसी जोड़-तोड़, खींचतान, दांव-पेच और लाबींग की जाती है वह साहित्य की गलियों में भटकने वाले अच्छी तरह जानते हैं । पूरा का पूरा एक तंत्र काम करता है इसके पीछे ।

इस गिरोह के ‘सक्रिय सदस्य ’ लिखने-पढने से ज्यादा इन्ही तिकड़मों में व्यस्त रहते हैं । अभी आजकल में ही मैत्रेयी पुष्पा का साक्षात्कार पढ़ रहा था । एक नारी को के बेहतर लेखन को पचा पाने में साहित्य जगत के मठाधीशों को होने वाली दिक्कत का जिक्र था । वाकया था मैत्रेयी की किताब अल्मा कबूतरी को पुरस्कार देने का इस पर कमलेश्वर का कहना था कि उसे ! उसके लिए तो राजेन्द्र यादव लिखते हैं । इसपर वहां मौजूद एक लेखिका ने बड़ी खरी टिप्पणी की कि राजेन्द्र एक अल्मा कबूतरी लिखकर दिखा दें तो जानूं ! उनके कहने का आशय महज यह था कि किताब में नारी की जो पीड़ा उभरी है वह एक नारी ही बयान कर सकती है । तो यह हाल है साहित्य के आसमां में चमकते चांद सितारों का । अब इससे नीचे के लेबिल पर किस-किस किस्म की चिरकुटई होती होगी सहज ही अंदाजा लगा लें । नया लेखक लाख क्रांतिकारी और उत्कृष्ट लिख कर मर जाए उसे सम्मान और पुरस्कार मिलने ही नहीं देते हैं उपर जमें बैठे मठाधीश ।

खैर यह तो हुई पुरस्कार को लेकर राजनीति की बात, अब पुरस्कारों पर भी जरा गौर करें । हिन्दी बोलने, जानने-समझने वालों की दुनिया इतनी बड़ी है । फिल्म, टीवी, मीडिया, पुस्तकें, संगीत से लेकर विज्ञापन तक अरबों-अरब का कारोबार चल रहा है हिन्दी के सहारे । पर हिन्दी के क्षेत्र में क्या है कोई ऐसा बड़ा ईनाम जो नोबेल और बुकर पुरस्कारों से टक्कर ले सके । यह बात अपनी जगह ठीक है कि पुरस्कार से जुड़ा सम्मान बड़ा होता है, पैसा नहीं, पर यह एक मेरी समझ में यह एक सैद्धांतिक बात है । व्यावहारिक नहीं । अंगरेजी में मात्र एक उपन्यास लिखने पर अरुंधती राय को बुकर के जरिए विश्वव्यापी सम्मान के साथ-साथ इतनी बड़ी राशि मिल जाती है कि जिंदगी भर कम से कम उन्हें आजीविका के बारे में सोचने की जरूरत नहीं । इन तनावों और संघर्ष से बेफिक्र होकर वह लिख-पढ़ सकती हैं ।

दूसरी ओर पहला गिरमिटिया जैसी उत्कृष्ट और शोधपरक किताब लिखने के लिए गिरिराज किशोर जैसे स्थापित साहित्यकार को पैसों के जुगाड़ में जगह-जगह भटकना पड़ जाता है और इसके चलते अर्सा लग जाता है उपन्यास पूरा करने में ।

तो यह है पुरस्कारों के अर्थ शास्त्र का व्यावहारिक पक्ष । मेरी समझ में हिन्दी के नाम पर करोड़ों कमाने वाले अगर मिल कर एक ऐसा पुरस्कार निर्धारित करें जो इन मायनों में बुकर और नोबेल को टक्कर दे सके तो बहुत बड़ी संख्या में नए लेखक हिन्दी के क्षेत्र में उभर कर सामने आ सकते हैं, पुरानों को भी इससे लाभ ही होगा क्योंकि पुरस्कार तो किसी को भी मिल सकता है। एक व्यापक और सामूहिक पहल से ही ऐसा किया जा सकता है ।

चिरकुटों के चंगुल में हमारी हिन्दी-2


पिछली कड़ी में हमने हिन्दी अखबारों और पत्रिकाओं में होने वाली चिरकुटई की बात की थी। आज चर्चा करते हैं इलेक्ट्रानिक मीडिया और लेखकों की दुनिया की । इलेक्ट्रानिक मीडिया में अखबारों की तरह बेगारी की समस्या तो अमूमन नहीं होती, पर यहां की अपनी अलग पेचीदगियां हैं । पहली बात तो यह कि इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता आज के दौर में पत्रकारिता कम, टेक्निकल टे्रड कहीं ज्यादा बन गई है । काम-काज में लिखने-पढ़ने का यहां बहुत स्कोप नहीं होता । ज्यादातर समय कैमरे या कम्प्यूटर के सामने सिर फोड़ते रहिए । जल्दबाजी का दबाव ऐसा कि दस में आठ आदमी हर वक्त टेंशन में ही रहते हैं । इसी मशीनीकरण से उबियाने के चलते ही बड़ी संख्या में चैनलों के साथी ब्लागिंग की दुनिया में उतरते हैं, केवल अपनी बौद्धिक संतुष्टि के लिए । इलेक्ट्रानिक माध्यमों में इसके अलावा एक बहुत बड़ी समस्या यह है कि यहां दाखिल होने के लिए लंबा जैक चाहिए । अगर आपका कोई परिचित किसी चैनल में अच्छी पोजीशन पर है तो किसी भी एक्स, वाई, जेड इंस्टीट्यूट से कोर्स कर लीजिए चाचा-मामा चैनल में फिट करवा देंगे आपको । वर्ना देते रहिए दस्तक पर दस्तक, कोई दरवाजा खोलने नहीं आता । चैनलों के दफ्तरों में बायोडाटा डालने के लिए अमूमन बाहर ही एक बाक्स रखा मिल जाएगा । उसमें बायोडाटा डालिए और भूल जाइये । बक्सा खोलकर देखने की जहमत भी नहीं उठाई जाती । कई जगह तो बताया जाता है कि हफ्ते-हफ्ते नौकरी, मान्सटर जैसी जाब साइट वाले ये बायोडाटा ले जाते हैं, महज अपना डाटाबेस बढ़ाकर अपना कारोबार फैलाने के लिए । कुल मिलाकर साहित्यिक रुचियों वाला या पढ़ने लिखने का शौक रखने वाला कोई आदमी इस क्षेत्र में उतरना चाहे तो उसे दाखिला मिलना ही बहुत मुश्किल है । करीब नब्बे फीसदी सीटें भाई-भतीजों और दिल्ली के इंस्टीट्यूटों के कंडीडेट्स से ही भर जाती हैं ।
उधर साहित्य की दुनिया में अपनी अलग ही किस्म की चिरकुटई है । किसी नए साहित्यकार को अपना वजूद साबित करने के लिए क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं यह तो वही बेचारा जानता है, जो भुगतता है । सेमिनारों, सभाओं में बड़े भाई लोग आंसू बहाते हैं कि नई प्रतिभाएं नहीं आ रहीं हैं, और हकीकत में नये तो क्या अच्छे-अच्छे पुरनियों को भी लंगड़ी लगाने में बिरादरी वाले पीछे नहीं रहते । सीधा सा सवाल है मेरा कि नई प्रतिभाओं को बढ़वा देने के लिए आज तक किसी ख्यातिनामा साहित्यकार ने व्यक्तिगत स्तर पर किया ही क्या है! क्या कोई ऐसी सहृदयता नहीं दिखा सकता कि अपने उपन्यास या संग्रह में अपने साथ एक नए लेखक की कहानी, कविताएं आदि भी छापे । मेरा अपना मानना है कि हिन्दी की दुर्दशा पर आंसू बहाने के बजाय अगर बड़े लेखक ऐसी कोई पहल करें तो हिन्दी का कुछ तो भला हो ही सकता है । वर्ना किताब छपवाने में प्रकाशकों के चक्कर लगाते-लगाते नए लेखकों की चप्पलें घिस जाती हैं । जिसको बहुत तमन्ना हुई वह जहां तहां से पैसा जुगाड़ कर खुद अपने खर्चे पर किताब की कुछ प्रतियां छपवा लेता है । यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि किसी नवोदित प्रतिभावान लेखक को लाख प्रयासों के बाद भी प्रकाशक नहीं मिलता, दूसरी ओर मल्लिका शेरावत और राखी सावंत आत्मकथा लिखने की घोषणा कर दें तो आज के आज उनके आगे प्रकाशकों की लाइन लग जाएगी । मोटी रायल्टी का पोस्ट डेटेड चेक लिए हुए । चर्चा के कुछ पहलू और भी हैं, जिन पर आगे चर्चा करेंगे।

चिरकुटों के चंगुल में हमारी हिन्दी


आज हिन्दी दिवस नहीं है! जानता हूं भई। फिर क्यों रो रहा हूं हिन्दी के नाम पर । अरे भाई मैं कोई बुद्धिजीवी, विद्वान या साहित्यकार नहीं जो मौका देख कर आंसू बहाउं, वह भी महज मंच पर । आम आदमी हूं । वो तो ससुरा रोज ही रोता है कभी खुद पर, कभी घर-परिवार पर तो कभी रोजी-रोटी, महंगाई को लेकर । आज ‘मूड’ बन पड़ा है तो भइया बहा लेने दो दो आंसू हमें भी हिन्दी मइया के नाम पर भी । गुस्ताखी माफ!
हां तो बात चल रही थी हिन्दी की दुदर्शा की। राष्ट्र भाषा की दुदर्शा देखकर जहन में पहला सवाल तो यह उठता है कि क्या वाकई हिन्दी दरिद्र है! जवाब नहीं भी है और हां भी । व्याकरण, रस-अलंकार, लालित्य, शब्द शक्ति और साहित्य के हिसाब से नहीं । एक दूसरे लिहाज से हिन्दी वाकई दरिद्र है । दरिद्र है क्यों कि हिन्दी चिरकुटों के चंगुल में फंसी हुई है । जिस ओर देखिए हिन्दी की दुनिया में चिरकुटई ही नजर आएगी । साहित्यिक पत्रिकाओं के मामले में, हिन्दी मीडिया के मामले में, पुरस्कारों के मामले में और जाने माने लेखकों की तंगदिली के मामले में हर जगह वही एक नजारा ।पहले साहित्यिक पत्रिकाओं की बात करते हैं । आज देश में साहित्यिक पत्रिकाएं तो प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद के समय से कहीं ज्यादा छप रही हैं । इनके स्वनामधन्य संपादक खुद को हिन्दी जगत में एक ‘सशक्त हस्ताक्षर’ के रूप में स्थापित करने में भी कामयाब हो रहे हैं । नये-नए लेखकों का लिखा भी खूब छप रहा हैं इनमें । पर रचना छपने के बाद जरा पारिश्रमिक मांग कर देखिए तो सही! साहित्यकार-संपादक जी की नानी मर जाएगी उसी वक्त । छापेंगे पर पैसा नहीं देंगे । खुद कमाएंगे, आपको नहीं देंगे । ये चिरकुटई नहीं तो और क्या है भाई ।
साहित्यिक पत्रिकाओं के बाद चलते हैं अब हिन्दी अखबारों और और पत्रिकाओं के संपादक जी के पास। इनकी महिमा जितनी बखानिए उतनी कम । मालिक के सामने दुम हिलाने में कुत्ता भी हार जाए इनके आगे । खुद कूकुर बन गए तो आपको केंचुआ बना कर ही छोड़ेंगे । बिना रीढ़ के रेंगते रहिए इनके आगे । उठने, खड़े रहने का शौक है तो क्यों आ गए पत्रकारिता में। कम से कम पैसे में लोगों से काम करा लेने का ठेका लिए बैठे हैं । शोषण का हर फार्मूला मालूम है इन्हें । नए पत्रकार की तन्ख्वाह लगाने की बात आएगी तो मालिक ढुड्डी खुजलाते हुए बोलेगा डेढ़ हजार । ये कहेंगे अरे पैसा देने की क्या जरूरत है इसके भाई की दुकान तो चल ही ही है पराठे वाली गली में । इसे तो बस नाम चाहिए। छाप देंगे महीने में दो-चार बाईलाइन । बाकी पैसा-वैसा आगे देखा जाएगा । मालिक एक बार फिर संपादक जी की मैनेजमेंट स्किल पर फिदा । दोनों मुस्कुराते हैं, और नवागंतुक पर अहसान जताते हुए कहते हैं- ठीक है आओ कल से, पहले कुछ काम-वाम कर के दिखाओ, फिर देखते हैं पैसे-वैसे की । तो तय हो गई एक बेगारी इस तरह । अब साल-डेढ़ साल तो मुफ्त में रगड़ेंगे ही इस उढ़क के टट्टू को । इलेक्ट्रानिक मीडिया में इस किस्म की चिकुटई तो नहीं है, पर वहां की अपनी अलग ही कहानी है । आज बस इतना ही । चर्चा जारी रहेगी।

25 March 2015

विनोद कापड़ी फिल्म के लिए इनाम पाए

आपको एक खबर बताएं, लंबे समय तक इंडिया टीवी और फिर न्यूज एक्सप्रेस में रहे वरिष्ठ पत्रकार और निर्देशक विनोद कापड़ी की डॉक्यूमेंट्री फिल्म शपथ को नेशनल अवॉर्ड मिला है. कांट टेक दिस शिट एनी मोर शीर्षक से प्रदर्शित कापड़ी की इस फिल्म में में भारत में महिलाओं के लिए शौचालय की कमी का मुद्दा उठाया गया है। इस फिल्म में यूपी के कुशीनगर के गांव खेसिया की 6 महिलाओं की कहानी दिखाई गई थी। इन महिलाओं ने ससुराल में शौचालय न होने पर न केवल आवाज उठाई, बल्कि शादी के कुछ ही समय बाद ससुराल छोड़ दिया। कापड़ी लंबे समय से मिस टनकपुर हाजिर हों नाम से भी एक फिल्म बना रहे हैं, जो अबतक पूरी नहीं हो पाई है।

भारत के गलत नक्‍शे पर आर्गनाइजर ने मांगी माफी

प्रखर राष्ट्र वाद का झंठा उठाने वाले हिन्दूवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के मुखपत्र आर्गनाइजर ने 15 मार्च के अंक में प्रकाशित नक्शे में जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से को पाकिस्तान के साथ दिखाने पर खेद जताया है।

आर्गनाइजर ने अपनी माफी में कहा है कि उसके ताजा अंक में कहा गया है कि असावधानी से इस तरह की गलती हो गई। पत्रिका के वेब संस्करण में गलत नक्शे को तत्काल सुधारा गया। इसके लिए हम अपने देशवासियों और सबसे बढ़कर अपने पाठकों और शुभचिंतकों से माफी चाहते हैं।

इस माफीनामे को आर्गनाइजर ने अपने 22 मार्च के अंक में छापा गया है। इसमें कहा गया है कि आर्गनाइजर देश की एकता और अखंडता को हमेशा सर्वोपरि मानता है।

आर्गनाइजर ने हमेशा इस बात का समर्थन किया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न व अविभाज्य अंग है। आर्गनाइजर ने इस बात पर दुख जताया है कि इंटरनेट से लेकर प्रकाशित किए गए एक नक्शे में पाक अधिकृत कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं दिखाया गया है।

स्वतंत्र मिश्रा समाचार प्लस से जुड़े

लंबे समय तक सहारा समूह में कई बड़े ओहदों पर रहे स्वतंत्र मिश्रा को नौकरी मिल गई है। कई किस्म के आरोपों के बाद सहारा से निकाले जाने पर स्वतंत्र मिश्र लंबे समय तक खाली रहे और मीडिया मार्केट से गायब रहे। अब उन्हें ठिकाना मिल गया है। वे ‘समाचार प्लस’ न्यूज चैनल से जुड़ गए हैं।

जानकारी के मुता‌बिक स्वतंत्र ने यहां प्रेसीडेंट आपरेशंस और एक्जिक्यूटिव एडिटर पद पर ज्‍वाइन किया है। मार्केटिंग और संपादकीय, दोनों विभाग एक साथ संभालेंगे।

समाचार प्लस में स्वतंत्र मिश्र को रेवेन्यू के मोर्चे पर लगाया गया और इस काम में वो माहिर भी रहे हैं। स्वतंत्र लखनऊ में बैठेंगे और एक्जीक्यूटिव एडिटर प्रवीण साहनी व डायरेक्टर उमेश कुमार को रिपोर्ट करेंगे।

15 March 2015

टेस्ट पोस्ट डाल रहा हूं

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