27 March 2015

चिरकुटों के चंगुल में हमारी हिन्दी


आज हिन्दी दिवस नहीं है! जानता हूं भई। फिर क्यों रो रहा हूं हिन्दी के नाम पर । अरे भाई मैं कोई बुद्धिजीवी, विद्वान या साहित्यकार नहीं जो मौका देख कर आंसू बहाउं, वह भी महज मंच पर । आम आदमी हूं । वो तो ससुरा रोज ही रोता है कभी खुद पर, कभी घर-परिवार पर तो कभी रोजी-रोटी, महंगाई को लेकर । आज ‘मूड’ बन पड़ा है तो भइया बहा लेने दो दो आंसू हमें भी हिन्दी मइया के नाम पर भी । गुस्ताखी माफ!
हां तो बात चल रही थी हिन्दी की दुदर्शा की। राष्ट्र भाषा की दुदर्शा देखकर जहन में पहला सवाल तो यह उठता है कि क्या वाकई हिन्दी दरिद्र है! जवाब नहीं भी है और हां भी । व्याकरण, रस-अलंकार, लालित्य, शब्द शक्ति और साहित्य के हिसाब से नहीं । एक दूसरे लिहाज से हिन्दी वाकई दरिद्र है । दरिद्र है क्यों कि हिन्दी चिरकुटों के चंगुल में फंसी हुई है । जिस ओर देखिए हिन्दी की दुनिया में चिरकुटई ही नजर आएगी । साहित्यिक पत्रिकाओं के मामले में, हिन्दी मीडिया के मामले में, पुरस्कारों के मामले में और जाने माने लेखकों की तंगदिली के मामले में हर जगह वही एक नजारा ।पहले साहित्यिक पत्रिकाओं की बात करते हैं । आज देश में साहित्यिक पत्रिकाएं तो प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद के समय से कहीं ज्यादा छप रही हैं । इनके स्वनामधन्य संपादक खुद को हिन्दी जगत में एक ‘सशक्त हस्ताक्षर’ के रूप में स्थापित करने में भी कामयाब हो रहे हैं । नये-नए लेखकों का लिखा भी खूब छप रहा हैं इनमें । पर रचना छपने के बाद जरा पारिश्रमिक मांग कर देखिए तो सही! साहित्यकार-संपादक जी की नानी मर जाएगी उसी वक्त । छापेंगे पर पैसा नहीं देंगे । खुद कमाएंगे, आपको नहीं देंगे । ये चिरकुटई नहीं तो और क्या है भाई ।
साहित्यिक पत्रिकाओं के बाद चलते हैं अब हिन्दी अखबारों और और पत्रिकाओं के संपादक जी के पास। इनकी महिमा जितनी बखानिए उतनी कम । मालिक के सामने दुम हिलाने में कुत्ता भी हार जाए इनके आगे । खुद कूकुर बन गए तो आपको केंचुआ बना कर ही छोड़ेंगे । बिना रीढ़ के रेंगते रहिए इनके आगे । उठने, खड़े रहने का शौक है तो क्यों आ गए पत्रकारिता में। कम से कम पैसे में लोगों से काम करा लेने का ठेका लिए बैठे हैं । शोषण का हर फार्मूला मालूम है इन्हें । नए पत्रकार की तन्ख्वाह लगाने की बात आएगी तो मालिक ढुड्डी खुजलाते हुए बोलेगा डेढ़ हजार । ये कहेंगे अरे पैसा देने की क्या जरूरत है इसके भाई की दुकान तो चल ही ही है पराठे वाली गली में । इसे तो बस नाम चाहिए। छाप देंगे महीने में दो-चार बाईलाइन । बाकी पैसा-वैसा आगे देखा जाएगा । मालिक एक बार फिर संपादक जी की मैनेजमेंट स्किल पर फिदा । दोनों मुस्कुराते हैं, और नवागंतुक पर अहसान जताते हुए कहते हैं- ठीक है आओ कल से, पहले कुछ काम-वाम कर के दिखाओ, फिर देखते हैं पैसे-वैसे की । तो तय हो गई एक बेगारी इस तरह । अब साल-डेढ़ साल तो मुफ्त में रगड़ेंगे ही इस उढ़क के टट्टू को । इलेक्ट्रानिक मीडिया में इस किस्म की चिकुटई तो नहीं है, पर वहां की अपनी अलग ही कहानी है । आज बस इतना ही । चर्चा जारी रहेगी।

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