01 April 2015

तेजी से बढ़ रही हैं मीडिया और पत्रकारों पर हमले की घटनाएं


लोगों से जुड़ी खबरें लोगों तक पहुंचाना पत्रकारों और मीडिया का काम है। सुनने में यह बात बड़ी साधारण सी लगती है, पर खबरें लोगों तक पहुंचाने का यह मूल कर्म ही पत्रकारों के लिए सबसे बड़ा जोखिम साबित होता है। दुनिया भर में हाल के दिनों में पत्रकारों की हत्या, पत्रकारों पर बढ़ते हमले और उनके अगवा होने और धमकियां दिए जाने की घटनाओं में आई तेजी इसकी तस्दीक करती है।
विएना स्थित अंतर्राष्ट्रीय प्रेस संस्थान (आईपीआई) की ओर से जारी की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक दशक में मीडिया कर्मियों या पत्रकारों के साथ ऐसी घटनों की संख्या काफी बढ़ गई है। डेथ वॉच लिस्ट के अनुसार 2014 में दुनिया भर में 100 पत्रकार मारे गए। इनमें भारत के केवल 2 पत्रकार शामिल थे। यह आंकड़ा वर्ष 2013 के मुकाबले काफी कम है। उस वर्ष भारत में 11 पत्रकार मारे गए थे। गौरतलब है कि 2013 में भारत दुनिया में मारे गए मीडियाकर्मियों की सूची में तीसरे स्थान पर पहुंच गया था। गौर करने वाली बात है कि 2013 में ही उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर में दंगा हुआ था। इस साल मरने वाले पत्रकारों में से 4 उत्तर प्रदेश में काम कर रहे थे। इनमें बुलंदशहर में ज़ाकाउल्लाह, इटावा में राकेश शर्मा और मुजफ्फर नगर में मारे गए राजेश वर्मा और इसरार शामिल थे। डेथ वॉच लिस्ट में उन पत्रकारों के नाम शामिल किए जाते हैं, जिन पर पत्रकारिता या उनके पत्रकार होने की वजह से हमला होता है।
गौरतलब है कि भारत को 2013 में पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में सीरिया और इराक के बाद दुनिया का तीसरा सबसे खतरनाक देश माना गया था। वर्ष 2004 से 2013 तक की डेथ वॉच सूची में भारत पत्रकारों की हत्या के मामले में सातवें स्थान पर रहा।  वर्ष 2014 की आईपीआई की सूची के अनुसार, एशिया रीजन में कुल 23 पत्रकार मारे गए थे। इनमें से सबसे अधिक 5 पत्रकार पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मारे गए।
जिला और स्थानीय स्तर पर काम कर रहे पत्रकार ज़्यादातर ख़बरें रिश्‍वतखोरी, राशन दुकान की मुनाफाखोरी, स्कूल में शिक्षकों के नदारद रहने की बात, ग्राम पंचायत के विवादित फैसले, अधिकारी की अनुपस्थिति, सड़कों व बिजली की समस्या और स्थानीय अधिकारीयों या विधायकों के कारनामों आदि की देते हैं। ऐसी खबरों के चलते कई बार उनकी जान तक खतरे में पड़ जाती है।

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