02 April 2015

गिरिराज की सोच से ज्यादा मीडिया के चरित्र पर उंगली उठाती है यह टिप्पणी


हम नहीं सुधरेंगे ...
भाजपा के दफ्तर के बाहर विरोध प्रदर्शन चल रहा है, पुतले जल रहे हैं। न्यूज चैनल पर संजय निरूपम चीख रहे हैं। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के घर के बाहर कांग्रेस की महिला ब्रिगेड धरना दिए बैठी है। सारा बवाल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर दिए उनके बयान को लेकर है।

सोनिया की ‘गोरी चमड़ी’को लेकर जो बात उन्होंने कही उसे लेकर कांग्रे‌सियों का गुस्सा उफान पर है। बात है भी आक्रोश जगाने वाली।

गिरिराज चमड़ी के रंग को लेकर जो बात कह रहे हैं, उसे सभ्य-शालीन तो कतई नहीं कहा जा सकता। इसे किसी भी तरह से औचित्यपूर्ण ठहराना भी मुनासिब नहीं होगा, इसका समर्थन करना तो खुद को भी मोदी मंत्रीमंडल के उन साधु-साध्वियों और मुंहजोर मंडली की उस कतार में ला खड़ा करना होगा, जो जब-तब कुछ न कुछ अंट-शंट बकती रहती है और अनुशासन, सुशासन का दम भरने वाले मोदी तमाशा देखते रहते हैं। 56 इंच का सीना एक इंच भी सिकुड़ता नहीं चहेतों की इन कारगुजारियों पर। नमो की इस मौन स्वीकृ‌ति के चलते ही एक के बाद एक बवालिया बयान भाजपा के खेमे से आते रहते हैं।

गिरिराज के हालिया बयान को भी मैं इसी कड़ी में देखता हूं। हालांकि इस मामले में एक दूसरा पहलू भी काफी अहम नजर आता है, जिसपर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यह बात है मीडिया के खुद के गिरते कैरेक्टर की। मेरी समझ में गिरिराज प्रकरण उनकी सोच से ज्यादा गहरे सवाल उठाता है मीडिया के बीमार होते जा रहे चरित्र पर। ध्यान से देखिये तो गिरिराज के जिस बयान को लेकर बखेड़ा खड़ा हो गया है, वह वास्तव में कोई ‘बयान’ नहीं है। गिरिराज आपसदारी में बैठे अनौपचारिक रूप से कुछ बातचीत कर रहे हैं। यह सबकुछ पूरी तरह से ऑफ दि रिकॉर्ड है और हम सब जानते हैं कि आपसी बातचीत में लोग किस-किस तरह की चर्चाएं करते हैं और उसकी भाषा शैली कैसी होती है।

गिरिराज कह रहे हैं कि राजीव गांधी अगर किसी नाइजीनियन महिला से शादी करते तो क्या उसे भी कांग्रेस इस तरह सिर-माथे बैठाती? क्या उसे भी ऐसा ही रुतबा मिलता? बात सही या गलत होने को लेकर बेशक सवाल उठ सकते हैं, पर इसे एक सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। देश-दुनिया और समाज की जो सोच है उसमें एक सवाल तो यह बनता है। इसके साथ सवाल यह भी उठता है कि मीडिया की ऐसी क्या मजबूरी थी कि पत्रकारिता के सारे नियम-कायदों और एथिक्स पर धूल डालते हुए इसे बुलेटिनों में धड़ाधड़ चला दिया गया।

चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज तक चली इसकी और फिर प्रिंट ने मीडिया भी इलेक्ट्रानिक माध्यम की अनुगामी बनकर पन्ने रंग डाले इसपर। आज के दौर की पता नहीं, पर भई हमने जो पत्रकारिता पढ़ी उसमें किसी की ऑफ दि रिकॉर्ड बात को उजागर करना अपराध बताया गया था, जब तक कि ऐसा करना राष्ट्र हित या समाज हित में न हा। इस प्रकरण में कौन सा राष्ट्र हित या समाज हित जुड़ा है बहुत प्रयास करके भी समझ नहीं पा रहा हूं। यह कोई पहला मौका नहीं है, जब टीवी चैनलों ने ऑफ द रिकॉर्ड कही जाने वाली किसी मामूली सी बात को सुर्खियां बना कर परोस दिया हो।

इससे पहले अग्निवेश और यूपी के बड़बोले मंत्री आजम खान की भी कुछ ऐसी ही बातें ‘खबर’ बन चुकी हैं। चैनलों की यही करतूत रही तो आने वाले दिनों में लोग कैमरे वालों को आसपास फटकने भी नहीं देंगे। अपने मतलब की बात कहने या बयान देने के बाद कैमरामैनों को तुरंत खदेड़ दिया जाएगा वहां से।

टीवी चैनलों के संपादक इस बात पर गौर क्यों नहीं करते भला। क्या उनके पास आइडियाज और कंटेंट की इतनी कमी हो गई है कि ऑफ दि रिकॉर्ड बातों को एजेंडा बनाया जा रहा है, वह भी तब, जबकि इस यह देश या समाज का हित करने वाली नहीं, बल्कि गुस्से या आक्रोश को उबाल देने वाली हो। क्या इस अंधी दौड़ से बचा नहीं जा सकता?

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