07 April 2015

आदत से हैं मजबूर, क्या करें हुजूर

इन्हें पता है कि मजाक बनेगा, फिर भी बड़े बोल बोलने से बाज नहीं आते। ये महाशय कोई और नहीं, बड़बोलेपन के लिए दुनिया भर में विख्यात हो चुके हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। बतोलेबाजी की आदत से अब यह बेचारे चाह कर भी छूट नहीं पा रहे हैं।
मोदी महाशय की यह बेबसी पर्यावरण मंत्रियों के सम्मेलन में खुद उनके बोल से उजागर हो गई। सम्मेलन में बिजली बचाने, रीसाइकलिंग और पर्यावरण संरक्षण के कुछ दादी मां सरीखे नुस्‍खे दिए। हफ्ते में एक दिन गाड़ी छोड़कर साइकिल चलाने की सलाह देने के बाद मोदी ने कहा कि उन्हें पता है कि उनकी इन बातो का मजाक उड़ाया जा सकता है। कोई कह सकता है कि मोदी साइकल कंपनियों के एजेंट बन गए हैं।
मोदी ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण भारत की परंपरा में रही है, इसके बावजूद भारत पर्यावरण के मुद्दों पर दुनिया का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं आ सका है। दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में मोदी ने 10 शहरों में प्रदूषण स्तर की निगरानी करने के लिए राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक की शुरुआत की। मोदी ने इस मौके पर पर्यावरण संरक्षण और बिजली बचाने के कुछ टिप्स भी सुझाए।
उन्होंने कहा कि भारत में रीसाइकलिंग की परंपरा सदियों पुरानी है। दादी मां घर में पुराने कपड़ों से रात को बिछाने के लिए कथरी बना देती थीं। उसके भी बेकार होने पर झाड़ू-पोछा के लिए उस कपड़े का इस्तेमाल होता है। गुजरात के लोग आम खाते हैं, लेकिन वे आम को भी इतना री-साइकल करते हैं कि कोई सोच भी नहीं सकता है।
मोदी ने चांदनी रात में बिजली बचाने का आह्वान भी किया। उन्होंने कहा कि अगर शहरी निकाय तय कर लें कि पूर्णिमा की रात को स्ट्रीट लाइट न जलाएं और पूरे मोहल्ले में सूई में धागा डालने का त्योहार मनाया जाए, तो इससे ऊर्जा बचाई जा सकती है। मोदी ने बताया कि कि गांवों में परंपरा थी कि चांदनी रात में दादी मां बच्चों को सूई में धागा डालना सिखाती थीं। ऐसा बच्चों को चांदनी के महत्व को समझाने के लिए होता था। आज की पीढ़ी को चांदनी रात का अहसास नहीं है।

No comments: